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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 185 of 421

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Page 185

पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय
वसु आदि देव याजकों को एक विचार होकर स्वर्ग में ले जाएं. ( १३ )
अधिपत्न्यसि बृहती दिग्विश्वे ते देवा ऽ अधिपतयो बृहस्पतिर्हेतीनां प्रतिधर्त्ता
त्रिणवत्रयस्त्रि १७ शौ त्वा स्तोमौ पृथिव्या १७ श्रयतां वैश्वदेवान्निमारुते उक्थे अव्यथायै
स्तभ्नीता १७ शाक्वररैवते सामनी प्रतिष्ठित्या ऽ अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु
दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य
पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानं च सादयन्तु.. (१४)
हे इष्टके! आप अधिपत्नी, विशाल, दिशा रूप व सब देवों के अधिपति हैं.
आप बृहस्पति देव के हेतु व प्रतिधारक हैं. हम त्रिणवयवयस्त्रिंशत स्तोम से आप
की प्रतिष्ठापना करते हैं. हम पृथ्वी पर आप की प्रतिष्ठापना करते हैं. वैश्वदेव
अग्निमरुत्देव उक्थ स्तोत्र के लिए आप की स्थापना करते हैं. शाक्वर साम आप
को अंतरिक्ष में प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. रैवत साम आप को अंतरिक्ष में
प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. पूर्व जन्मे ऋषि दिव्यलोक में श्रेष्ठ दैवी गुणों को
व्याप्त करें. वांछित कार्यों के कर्ता मुख्य देव भी आप का विस्तार करें. इस तरह
समस्त वसु आदि देव एक विचार से सुख संपन्न हों. ( १४ )
अयं पुरो हरिकेशः सूर्यरश्मिस्तस्य रथगृत्सश्च रथौजाइच सेनानीग्रामण्यौ.
पुञ्जिकस्थला च क्रतुस्थला चाप्सरसौ दङ्क्ष्णवः पशवो हेतिः पौरुषेयो वधः
प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां
जम्भे दध्मः.. (१५)
यह देव हरे केशों वाले हैं. सूर्य की किरणों की भांति हैं. आप रथज्ञान में निपुण
हैं, अग्रणी, सेनानायक, ग्रामस्थलों के नायक, यज्ञस्थल के नायक हैं. आप अप्सराओं
के नायक हैं. पशु आप के हथियार हैं. आप ताकतवर का भी वध करने में समर्थ हैं.
हम सभी देवताओं के साथ अग्नि को नमन करते हैं. वे हमारी रक्षा करें. वे हमें सुख
प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन सब को अग्नि
अपने जबड़े में धारने की कृपा करें. ( १५ )
अयं दक्षिणा विश्वकर्मा तस्य रथस्वनश्च रथेचित्रश्च सेनानीग्रामण्यौ.
मेनका च सहजन्या चाप्सरसौ यातुधाना हेती रक्षा १७ सिप्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते
नोवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (१६)
दक्षिण दिशा में विश्वकर्मा देव को स्थापित किया गया है. विश्वकर्मा देव
रथवान, सेनानी, ग्राम रक्षक, अग्रणी व मेनका तथा सहजन्य इन की अप्सराएं हैं.
राक्षस इन के अस्त्रशस्त्र हैं. विश्वकर्मा देव हमारी रक्षा करें. अग्नि हमें सुख प्रदान
करें. जो हम से द्वेष करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन सब को अग्नि अपने
जबड़े में धारने की कृपा करें. ( १६ )
यजुर्वेद - १८५