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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

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Page 163

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
आप भूमि जैसी सुखदायी और विश्व को धारण करने वाली अदिति हैं. आप
सारे विश्व की धारिका हैं. आप पृथ्वी पर अपनी कृपा कीजिए. आप उसे दृढ़
बनाइए. आप उस पर हिंसा मत होने दीजिए. ( १८ )
विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानायोदानाय प्रतिष्ठायै चरित्राय.
अग्निष्ट्वाभि पातु मह्या स्वस्त्या छर्दिषा शन्तमेन तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवा
सीद.. (१९)
हे देवी! समस्त प्राण, अपान, व्यान व उदान शरीरस्थ ( वायु के भेद ) की
प्रतिष्ठा के लिए आप की स्थापना की जाती है. अग्नि आप की रक्षा करें. शीतल
शांतिमय साधनों से आप का कल्याण हो. दिव्यता से आप अंगिरा के समान ध्रुव
हो कर विराजने की कृपा कीजिए. ( १९ )
काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि.
एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्रेण शतेन च.. (२०)
हे दूर्वा! आप सभी जगह भलीभांति उग जाती हैं. अपनी तरह हमारी भी संतान
और धनवृद्धि की कृपा कीजिए. ( २० )
या शतेन प्रतनोषि सहस्रेण विरोहसि.
तस्यास्ते देवीष्टके विधेम हविषा वयम्.. (२१)
हे दूर्वा! हम आप के लिए वैसी ही हवि का विधान करते हैं, जिस से आप
सैकड़ों हजारों की संख्या में उग कर बढ़ें. ( २१ )
यास्ते अग्ने सूर्ये रुचो दिवमातन्वन्ति रश्मिभिः.
ताभिर्नो अद्य सर्वाभी रुचे जनाय नस्कृधि.. (२२)
हे अग्नि! सूर्य देव की जो चमकीली किरणें स्वर्गलोक का विस्तार करती हैं,
आज उन किरणों से मनुष्यों का विस्तार हो. ( २२ )
या वो देवाः सूर्ये रुचो गोष्वश्वेषु या रुचः.
इन्द्राग्नी ताभिः सर्वाभी रुचं नो धत्त बृहस्पते.. (२३)
हे इंद्र! हे अग्नि! हे बृहस्पति! आप की जो कांति सूर्यरूप में शोभित है, जो गायों,
घोड़ों में स्थित है, आप वह सारी कांति हमारे लिए धारण करने की कृपा कीजिए. ( २३ )
विराड्ज्योतिर्धारयत्स्वराड्ज्योतिर्धारयत्.
प्रजापतिष्ट्वा सादयतु पृष्ठे पृथिव्या ज्योतिष्मतीम्.
विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानाय विश्वं ज्योतिर्यच्छ.
अग्निष्टेऽधिपतिस्तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.. (२४)
विराट् शक्ति ने ज्योति को धारण किया. स्वयं ज्योतिर्मय ने ज्योति को धारण
यजुर्वेद - १६३