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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

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Page 161

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
समान मूल स्थान में संचरण करते हैं. सात होता द्रप्स को आहुति प्रदान करते हैं. ( ५ )
नमोस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु.
ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः.. ( ६ )
जो सर्प पृथ्‍वी का अनुकरण करते हैं, उन्हें नमन. जो सर्प अंतरिक्ष और स्वर्ग
का अनुकरण करते हैं, उन्हें भी नमन. ( ६ )
या ऽ इषवो यातुधानानां ये वा वनस्पती ँ४१ रनु.
ये वावटेषु शेरते तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः.. (७)
जो राक्षसों के बाण रूप सर्प हैं, जो वनस्पतियों का अनुकरण करने वाले सर्प
हैं, उन्हें नमन. जो गड्ढों और निचले भागों में रहते हैं, उन सर्पों को भी नमन. ( ७ )
ये वामी रोचने दिवो ये वा सूर्यस्य रश्मिषु.
येषामप्सु सदस्कृतं तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः.. (८)
जो चमकते हुए स्वर्गलोक में वास करते हैं, जो सूर्य की किरणों में वास करते
हैं, जिन का जल के भीतर घर है, उन सर्पों को नमन. ( ८ )
कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीं याहि राजेवामवाँ २ इभेन.
तृषीमनु प्रसितिं द्रूणानो ऽ स्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः.. (९)
हे अग्नि! आप दुष्टों को कष्ट दीजिए. आप राजा की तरह हाथी पर सवार हो
कर शत्रुओं पर आक्रमण कीजिए. आप राक्षसों को तपाइए. विस्तृत जाल की तरह
आप अपनी सामर्थ्य का जाल और अधिक पसारिए. ( ९ )
तव भ्रमास ऽ आशुया पतन्त्यनुस्पृश धृषता शोशुचानः.
तपूं ष्यग्ने जुह्वा पतङ्गान्सन्दितो वि सृज विष्वगुल्काः.. (१०)
हे अग्नि! आप भ्रमणशील हैं. आप शीघ्र अपनी चमकती हुई लपटों से राक्षसों
को भस्म कर दीजिए. हमारी आहुति से आप की लपटें ( ऊंचीऊंची ) बढ़ गई हैं.
आप अपनी उन लपटों से राक्षसों का नाश कर दीजिए. ( १० )
प्रति स्पशो वि सृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या ऽ अदब्धः.
यो नो दूरे अघश ँ४ सो यो अन्त्यग्ने मा किष्टे व्यथिरादधर्षीत्.. (११)
हे अग्नि! कोई भी हमें तकलीफ न पहुंचा सके. कोई भी हमें व्यथा न पहुंचा
सके. आप हमारे दूर या पास जहां कहीं भी कोई भी दुश्मन हो, उन्हें अपने पाश में
बांधने की कृपा कीजिए. ( ११ )
उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्व न्यमित्राँ २ ओषतात्तिग्महेते.
यो नो अराति ँ४ समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यतसं न शुष्कम्.. (१२)
यजुर्वेद - १६१