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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 136 of 421

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Page 136

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
करने की कृपा करें. अंगिरा के समान आप को धारने व खोदने की कृपा करें. विश्व
देवी सभी दिव्यगुणों की कृपा करें. अंगिरा की तरह आप को प्रज्वलित करने व
खोदने की कृपा करें. विश्व देवी दिव्य गुणों सहित धारने की कृपा करें. हे मिट्टी
देव! अंगिरा ऋषि की तरह आप को पकाने की कृपा प्रदान करें. विश्व देवी निरंतर
गतिशील करने की कृपा प्रदान करें. ( ६१ )
मित्रस्य चर्षणीधृतो ऽ वो देवस्य सानसि. द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम्.. (६२)
हम पोषक शक्ति से प्रकाशवान, मित्र देवता के शाश्वत तथा आश्चर्यजनक
पदार्थों से युक्त ऐश्वर्य धारण करें. ( ६२ )
देवस्त्वा सवितोद्वपतु सुपाणिः स्वङ्गुरिः सुबाहुरुत शक्त्या.
अव्यथमाना पृथिव्यामाशा दिश ऽ आपृण.. (६३)
हे उखे! सब को पैदा करने वाले सविता अपनी उत्तम भुजाओं और अंगुलियों यानी
दिव्य किरणों से, अपनी सामर्थ्य एवं बुद्धि कौशल से आप को प्रकाशित करें. आप
पृथ्वी पर दुःखरहित हो कर अपनी अच्छी इच्छाओं और ऊंचे उद्देश्य प्राप्त करें ( ६३ )
उत्थाय बृहती भवोदु तिष्ठ ध्रुवा त्वम्.
मित्रैतां त ऽ उखां परिददाम्यभित्या ऽ एषा मा भेदि.. (६४)
हे उखे! आप गर्त से निकल कर बड़े हों. आप स्थायी हो कर काम करें. हे मित्र
देव! हम इस पवित्र बरतन को नष्ट होने के डर से आप को सौंपते हैं. यह टूटे नहीं.
यह अच्छी तरह से कार्य करे. ( ६४ )
वसवस्त्वाच्छन्दन्तु गायत्रेण छन्दसाङ्गिरस्वद्रुद्रास्त्वाच्छन्दन्तु त्रैष्टुभेन
छन्दसाङ्गिरस्वदादित्यास्त्वाच्छन्दन्तु जागतेन छन्दसाङ्गिरस्वद्विश्वे त्वा देवा वैश्वानरा
ऽ आच्छन्दन्त्वानुष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वत्.. (६५)
हे उखे! गायत्री छंद के स्तोत्रों से वसुगण आप को अभिषिक्त ( सम्मानित ) करें.
त्रिष्टुप् छंद से रुद्रगण आप का सम्मान करें. जगती छंद के प्रभाव से आदित्यगण
आप का सम्मान करें. अनुष्टुप् छंद की सामर्थ्य से विश्वे देवा अंगिरा के समान आप
का सम्मान करें. ( ६५ )
आकूतिमग्निं प्रयुज ᳪ स्वाहा मनो मेधामग्निं प्रयुज ᳪ स्वाहा चित्तं विज्ञातमग्निं
प्रयुज ᳪ स्वाहा वाचो विधृतिमग्निं प्रयुज ᳪ स्वाहा प्रजापतये मनवे स्वाहाग्नये
वैश्वानराय स्वाहा.. (६६)
अग्नि अच्छे कामों में लगाने वाले हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. अग्नि अच्छे कामों
में मन और बुद्धि को लगाने वाले हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. अग्नि चित्त को विशेष
ज्ञान के लिए प्रेरित करते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. अग्निवाणी को विशेष रूप से
१३६ - यजुर्वेद