यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextनौवां अध्याय
देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपतिं भगाय.
दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाजं नः स्वदतु स्वाहा.. (१)
हे सविता! हम आप की कृपा से इस यज्ञ को विधिवत पूरा करें. आप यज्ञपति
को सौभाग्यवान बनाने की कृपा कीजिए. आप की किरणें दिव्य हैं. आप उन
किरणों से हमारे अन्न को पवित्र कीजिए. हमारा वह अन्न वाचस्पति देव को भी
बलवान बनाने वाला हो. वाचस्पति देव के लिए स्वाहा. वह अन्न हमें भी स्वादिष्ट
लगे. ( १ )
ध्रुवसदं त्वा नृषदं मनःसद्मुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय
त्वा जुष्टमम्.
अप्सुषदं त्वा घृतसदं व्योमसद्मुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते
योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्.
पृथिविसदं त्वान्तरिक्षसदं दिविसदं देवसदं नाकसदमुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं
गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्.. (२)
हे सोम! आप ध्रुव ( स्थिर ) रूप से प्रतिष्ठा प्राप्त हैं. आप मनुष्यों के मन में
रमते हैं. आप इंद्र देव की योनि हैं. इंद्र देव भी आप को ग्रहण करते हैं. आप उपयाम
( पात्र ) में पधारिए. आप सर्वाधिक चाहे गए देव हैं. आप जल, घी व व्योम
( आकाश ) में वास करते हैं. हम आप को इंद्र के लिए ग्रहण करते हैं. आप इंद्र देव
की योनि व इष्टतम हैं. आप बरतन में पधारने की कृपा कीजिए. आप पृथ्वी,
अंतरिक्ष व स्वर्गलोक में निवास करते हैं. आप देवों के योग्य हैं. आप सोम को इंद्र
देव के लिए ग्रहण करते हैं. आप इंद्र देव की योनि और आप इष्टतम हैं. ( २ )
अपा ँश रसमुद्वयस ँश सूर्ये सन्त ँश समाहितम्.
अपा ँश रसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष
ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्.. (३)
हे सोम! आप जल और रसों के सार, सूर्य में समाए व जल के सार के भी सार
हैं. उस रस को हम पात्र में ग्रहण करते हैं. हम आप को इंद्र देव के लिए बरतन में ग्रहण
यजुर्वेद - १०७