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विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

by महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री

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DevanagariSanskritpublished493 pages

Page 58 of 493

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Page 58

( ३३ )
• (स त्वत्पादसेवारजसां प्रभाव इत्यग्रे सम्बन्धः) नीलभ्रमरसमूहेन नीलच्छत्रस्य
साम्यादुपमा। नेत्रेषु पद्मत्वारोपाद्रूपकम्। कृष्ण चञ्चलताराणां लोलालि-
त्वेनाध्यवसितत्वादतिशयोक्तिः। अत्रैषामङ्गाङ्गिभावसङ्करः।
भाषा
यह जो मेरे सहस्रनेत्र रूपी सहस्र कमलो में स्थित चञ्चल पुतलियो के
स्वरूप चञ्चल भ्रमर समूह की नीलिमा के समान नीले रंग का छत्र, राज्य
श्री के मुखपर कस्तूरी के तिलक की शोभा दे रहा है। (वह आपकी चरण
सेवा की धूली का प्रभाव है। यह ४३ वें श्लोक से सम्बन्धित है।)
यन्नन्दने कल्पमहीरुहाणां छायासु विश्रम्य रतिश्रमेण।
गायन्ति मे शौर्यरसोज्जितानि गीर्वाणसारङ्गदृशो यशांसि ॥४२॥
अन्वयः
यत् गीर्वाणसारङ्गदृशः रतिश्रमेण नन्दने कल्पमहीरुहाणां छायासु
विश्रम्य मे शौर्यरसोज्जितानि यशांसि गायन्ति (स त्वत्पादसेवारजसां
प्रभाव इत्यग्रिमेण श्लोकेन सम्बन्धः)
व्याख्या
यदिति वाक्यार्थपरामर्शकः, “स्वामिन् स सर्वोपी”त्यत्र तच्छब्देनाऽन्वेति।
शारङ्गरस्य मृगस्य दृगिव दृग् नेत्रं यासां ता गीर्वाणानां देवानां सारङ्गदृशो मृगनयन्यः
कान्ता रतिश्रमेण सम्भोगजनितपरिश्रमेण खिन्नाः सत्यो नन्दने नन्दनाम्केन्द्रो-
द्याने 'स्य उच्चैः श्रवासूतो मातलिर्नन्दनं वनम्' इत्यमरः। कल्पमहीरुहाणां
कल्पवृक्षाणां छायासु विश्रम्य श्रमं निवार्य मे ममेन्द्रस्य शौर्यरसेन वीररसेनोर्ज्जि-
तानि प्रवृद्धानि यशांसि स्तोत्राणि गायन्ति भजन्तीत्यर्थः।
भाषा
यह जो सम्भोग से थकी हुई मृगनयनी देवियां नन्दन वन में कल्पवृक्षो की
छाया में विश्राम कर मेरे वीररस से परिवर्द्धित यशो का गान करती है (यह
आपकी चरण सेवा की धूलि का प्रभाव है—यह ४३ वे श्लोक से सम्बन्धित है।)
३