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विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

by महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री

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DevanagariSanskritpublished493 pages

Page 48 of 493

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Page 48

( २७ )
गङ्गासम्बन्धादेव मृदोऽप्यभ्यर्हितत्वं न तु स्वतः । अत्र दृष्टान्तालङ्कारः ।
अन्यसम्बन्धेन श्लाघ्यत्वकथनादुदात्तालङ्कारश्च । 'लोकातिशय-सम्पत्तिवर्ण-
नोदात्तमुच्यते । यद्वापि प्रस्तुतस्याङ्गं महतां चरितं भवेत्' ।
भाषा
मेरी नीरस वाणी का भी व्यापार (यह काव्य) राजा विक्रमाङ्कदेव के
चरितों के कारण आदरणीय होगा। कौन मनुष्य गङ्गा की नीरस मिट्टी
(सूखी मिट्टी) को अपने मस्तक पर धारण नहीं करते अर्थात् नहीं लगाते ।
अर्थात् गङ्गा का सम्बन्ध होने से सूखी मिट्टी भी जैसे आदरणीय होती है वैसे ही
महाराज विक्रमाङ्कदेव का सम्बन्ध होने से मेरा नीरस काव्य भी आदरणीय
होगा ।
कर्णामृतं सूक्तिरसं विमुच्य दोषे प्रयत्नः सुमहान्खलानाम् ।
निरीक्षते केलिवनं प्रविश्य क्रमेलकः कण्टक-जालमेव ॥२६॥
अन्वयः
खलानां कर्णामृतं सूक्तिरसं विमुच्य दोषे सुहान् प्रयत्नः । क्रमेलकः
केलिवनं प्रविश्य कण्टकजालम् एव निरीक्षते ।
व्याख्या
खलानां पिशुनानां 'पिशुनो दुर्जनः खलः' इत्यमरः । कर्णयोरमृतं श्रुति-
रसायनं सूक्तिरसं सुभाषितानन्दं विमुच्य परित्यज्य दोषे दोषावेषणे (एव)
सुमहान्विरोषः प्रयत्नः प्रयासो भवति । क्रमेलक उष्ट्रः केलिवनं क्रीडोद्यानं
प्रविश्य गत्वा कण्टकानां कण्टकीयवृक्षाणां जालं समूहमेव निरीक्षते पश्यत्यन्विष्य-
तीत्यर्थः । तेषां कृते कण्टकीवृक्षाणामेव प्रियत्वं न तु सुगन्धिपुष्पादिभिरुद्यान-
रमणीयताया इति भावः । अत्र दृष्टान्तालङ्कारः ।
भाषा
खललोग कान को अमृत के समान सुख देने वाले अच्छे सुभाषितों के रस
का आस्वादन छोड़कर उनमें दोष देखने में ही अत्यन्त प्रयत्न शील रहते हैं ।
सुन्दर बाग में जाकर उसकी पुष्पवृक्ष आदि की शोभा से आनन्द न प्राप्तकर
ऊँट, कांटे की झाड़ियों की ही खोज में रहता है । अर्थात् ऊँट को जिस प्रकार
अच्छे बाग में जाकर भी काँटे की झाड़ी ही प्रिय मालूम होती है वैसे भलो को