विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
by महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री
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Read in contextकृतेय श्री राज्यलक्ष्मीर्दासी सेयिका ननु निश्चयेन, सेषा पृथ्वीभुजां भूभुजामा-
श्रितानामवलम्बितानामाधय विधाय वसता सिंहदेव-महाकविप्रभृतीना पोषणाय
भरणाय किं नाम गहन कठिनम्। तेषा भरणपोषगेष्वेतादृशाना महाप्रतापिना
राज्ञा किमपि काठिन्य नास्तीति भाव ।
भाषा
इस श्रीमान् आहवमल्लदेव के पुत्र विक्रमाङ्कदेव ने उसी शोभन दिन ही
अत्यन्त दयालुता के कारण अपने छोटे भाई सिंहदेव को विशाल सम्पत्ति का
भाजन बनाया । अर्थात उसे वनवासिमण्डल का राजा बना दिया। जिन
राजाओ के घरो में पराक्रम रूप धन से खरीदी हुई यह लक्ष्मी निश्चय पूर्वक
दासी बन कर रहती है उन राजाओ को अपने आश्रितो का (सामदेव तथा
अन्य महाकवि गुणी आदि का) पालन पोषण करना क्या कठिन है।
इति श्री त्रिभुवनमल्लदेव विद्यापति-काश्मीरकभट्ट महाकवि बिल्हणविरचिते
विक्रमाङ्कदेवचरिते महाकाव्ये षष्ठ सर्ग ।
नेत्रान्जाभ्रयुगाङ्कविक्रमशरत्कालेऽत्र दामोदरात्
भारद्वाजवुधोत्तमात्समुदितः श्रीविश्वनाथः सुधीः ।
चक्रे रामकुबेर-पण्डितवरात्सम्प्राप्तसाहाय्यक-
ष्टीकायुग्ममिदं रमाकुरुषया सर्गेऽत्र षष्ठे नवम् ॥
ॐ शान्ति शान्ति शान्ति ।