विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
by महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री
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• शोक मनाने के बाद, द्रविड़देश के राज्य में विप्लव होने की खबर सुन
कर, दुःखिन हो, वह विक्रमाङ्कदेव, कुलीन चोलराजा वीर राजेन्द्र के अधिराज-
राजेन्द्र नामक पुत्र को राजगद्दी पर बैठाने के लिये चल पड़ा ।
करटिशतविकीर्णकर्णताल-व्यजनसमीरणशीतलीकृतानि ।
अथ धरणिभुजां पिबन्यशांसि क्षितिपतिरादिपुरीमवाप काञ्चीम् ॥१०॥
अन्वयः
अथ क्षितिपतिः करटिशतविकीर्णकर्णतालव्यंजनसमीरणशीतलीकृतानि
धरणिभुजां यशांसि पिबन् आदिपुरीं काञ्चीम् अवाप ।
व्याख्या
अथ चोलदेशम्प्रति प्रस्थानानन्तर क्षितिपतिः पृथिव्या अधिष्ठाता करटीनां
गजाना शतं तेन विकीर्णानि विक्षिप्तानि कर्णा एव तालाः तालवृक्षपर्णानि
तान्येव व्यजनानि तालवृन्तानि तेषां समीरणेन पवनेन शीतलीकृतानि, अशोतलानि
शीतलानि कृतानीति शीतलीकृतानि 'ष्विः' प्रत्ययः । विपक्षनृपाणा प्रतापजनि-
तोष्मानिवार्य हिमीकृतानि धरणिभुजा पृथिवीपालानां यशांसि कीर्तीः दुग्धमिव
पिबन् गृह्णन्नादिपुरीं प्रथमनागरीं काञ्चीं तन्नामचोलराजधानीमवाप सम्प्राप्तः ।
यशसः श्वैत्य प्रसिद्धमिति शुग्धरूपता व्यज्यते, एधं शत्रुभूपानां यशोदुग्धं
पिवन्निव समाऽऽजगामेति भावः ।
भाषा
चोलदेश के प्रति प्रस्थान करने के अनन्तर, सैकडो हाथियो के हिलाए हुए
कान रूपी ताल पत्र के पंखो से उत्पन्न वायु से ठण्डे किए हुए विपक्षी राजाओ
के यशो का पान करते हुए वह पृथ्वी का सरक्षक विक्रमाङ्कदेव प्राचीन नगरी
काञ्ची में पहुँच गया । अर्थात् हाथी की सेना से शत्रुओ को परास्त कर
उनकी प्रताप की गर्मी शान्त होने से उनका शीतल दुग्ध के समान यश, अपने
परिश्रम से लगी प्यास को मिटाने के लिए, पान करता हुआ काञ्ची नगरी
में पहुँचा ।