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विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

by महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री

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DevanagariSanskritpublished493 pages

Page 275 of 493

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Page 275

( २५९ )
भाषा

  • हाय ! अत्यन्त कोमल हृदय, मेरे बड़े भाई सोमदेव ने इस शो
    काग्नि को मेरे वहाँ न रहने पर कैसे सहन किया होगा। अर्थात् दु
    प्रियवस्तु के पास रहने से दुख का वेग कम हो जाता है। मैं उसका अ
    प्रिय हूँ। अतः मेरी अनुपस्थिति में उसने इस दुख को कैसे सहन किया होग
    साक्रन्दमिति चान्यच्च स संचिन्त्य पुनः पुनः।
    शनैर्विवेकदीपेन पंन्थानं प्रत्यपद्यत ॥८७॥
    अन्वयः
    सः इति अन्यत् च पुनः पुनः साक्रन्दं संचिन्त्य विवेकदीपेन शनैः
    पन्थानं प्रत्यपद्यत ।
    व्याख्या
    स विक्रमाङ्कदेव इति च पूर्वोक्तं विषयञ्चान्यञ्च किञ्चिन्मनोगतञ्च पुनः
    पुनर्भूयोभूयस्साक्रन्दं सविलापं यथास्यात्तथा संचिन्त्य विचार्य विवेक एव सदस-
    द्विचार एव दीपः प्रकाशकारकस्तेन सदसद्विचारप्रकाशेन शनैः क्रमशः पन्थानं
    मार्गं स्वस्थतां प्रत्यपद्यत प्राप्तवान्। विवेकप्रकाशेन शोकतमो निरस्य शनैः
    यथाकथञ्चित् स्वस्थो बभूवेति भावः।
    भाषा
    वह विक्रमाङ्कदेव पूर्वोक्त तथा अन्य भी कुछ मानसिक बातों का रोते
    हुए बार बार विचार कर धीरे धीरे विवेक रूपी दीप के प्रकाश से (शोक रूपी
    अन्धकार को दूर कर) रास्ते पर आया। अर्थात् कुछ स्वस्थ हुआ।
    यथाविधि विधायाथ संस्थितस्य पितुः क्रियाम् ।
    अग्रजालोकनोत्कण्ठा-प्रेरितः सोऽचलत्पुरः ॥८८॥
    अन्वयः
    अथ सः संस्थितस्य पितुः क्रियां यथाविधि विधाय अग्रजालोकनो-
    त्कण्ठाप्रेरितः (सन्) पुरः अचलत्।