विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
by महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री
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Read in context( २०३ )
प्रीतिर्यस्य तेन पलायनोत्तरलितमनसा तेनैरावतेनाऽप्येष दूरं रणभूमितो महदन्तरं
समुत्सारितोऽपनीतः। विक्रमाङ्कदेवस्य गजा गन्धगजा आसन्निति भावः।
यस्य गन्धं समाघ्राय पलायन्तेऽपरे गजाः। स सुगन्धगजः प्रोक्त इति। अत्राति-
शयोक्तिरलङ्कारस्तेनाऽस्य लोकोत्तरं शौर्यं ध्वन्यते।
भाषा
इन्द्र को इस विक्रमाङ्क देव का संग्राम देखने की उत्कण्ठा हुई। परन्तु
इन्द्र का घोड़ा उच्चैःश्रवा, इस राजकुमार के कान तक खींच कर चलाये
जाने वाले धनुष के टङ्कार को न सहन कर सका। अर्थात् उसके धनुष के
टङ्कार से भड़क गया। इसलिये इन्द्र ऐरावत नाम के अपने हाथी पर सवार
हुआ। परन्तु इस राजकुमार के युद्ध की भावना से क्रोधयुक्त गन्ध गजों की
गन्ध से (भयभीत होकर) भाग जाने में ही प्रेम रखने वाला अर्थात् अपना
कल्याण समझने वाला ऐरावत भी इन्द्र को युद्धभूमि से दूर भगा ले गया।
काञ्ची पदातिभिरमुष्य विलुण्ठिताभूद्-
देवालयध्वजपटावलिमात्रशेषा।
लुण्टाकक्षुप्तनिखिलाम्बरडम्बराणां
कौपीनकार्पणपरेव पुराङ्गनानाम् ॥७६॥
अन्वयः
अमुष्य पदातिभिः विलुण्ठिता (सती) देवालयध्वजपटावलिमात्रशेषा
काञ्ची लुण्टाकक्षुप्तनिखिलाम्बरडम्बराणां पुराङ्गनानां कौपीनकार्पणपरा
इव अभूत्।
व्याख्या
अमुष्य विक्रमाङ्कदेवस्य पदातिभि पादचारिसैनिकैर्विलुण्ठिता हृतावपहृत-
सर्वस्वा सती देवानामालया देवास्तया देवमन्दिराणि तेषां ध्वजेषु पताकासु
संसक्ता या पटावलिस्तन्मात्रमेव पताकांशुकान्येव शेषोऽवशिष्टवस्त्रभागो यस्यां
सा काञ्ची तन्नाम्नी चोलराजधानी लुण्टाकैर्हठापहरणशीलैर्लुप्तान्यपहृतानि
निखिलाम्बराणामखिलवस्त्राणां डम्बराण्याटोपा यासां तास्तासां पुराङ्गनानां