Skip to content
SarvaKosh
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

by भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी

Source: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished256 pages

Page 86 of 256

Read in context
Page 86

विज्ञानभैरव : २९
'कुम्भक' अवस्था कही जाती है। बाहर और भीतर दोनों स्थानों में निष्पन्न होने से यह बाह्य
और आन्तर के भेद से दो तरह की होती है। मनुष्य के श्वास-प्रश्वास की निरन्तर चलने
वाली स्वाभाविक प्रक्रिया से निष्पन्न होने वाली इन रेचक, पूरक तथा बाह्य एवं आन्तर कुम्भक
अवस्थाओं का निरन्तर सावधानी से निरीक्षण¹ करने वाला योगी फिर आवागमन के चक्कर
में नहीं पड़ता।
पातंजल योग में प्राणायाम के अभ्यास से प्राण वायु की गति को नियन्त्रित इसलिये
किया जाता है कि उसी अभ्यास की पद्धति से मन को भी नियन्त्रित किया जा सके। सहज
योग के प्रतिपादक इस ग्रन्थ में न तो प्राण वायु के और न मन के ही निग्रह के लिये कोई
आयास-साध्य उपाय बताया गया है। वायु स्वभाव से ही चल है। चलते-फिरते, सोते-जागते,
उठते-बैठते प्राणों की गति निरन्तर चलती रहती है। सकल, प्रलयाकल प्रभृति प्रमाता जीवों
में ही नहीं, पशु पक्षी, मृग आदि में भी सदा, सर्वत्र दिन-रात बिना प्रयत्न के स्वाभाविक रूप से
आठ प्रकार के प्राणायाम निरन्तर निष्पन्न होते रहते हैं। इन आठ प्रकार के प्राणायामों के
स्वरूप को ठीक तरह से जान लेने पर योगी मुक्त हो जाता है। साधक जो कुछ करता है, उन
सभी अवस्थाओं में अपने स्वाभाविक बोध से इन कुम्भक प्रभृति प्राण की अवस्थाओं को
जानता रहता है, वह अन्तर्मुख हो जाता है, अर्थात् सब कुछ करते हुए भी वह उनमें लिप्त
नहीं होता।
इन आठ प्राणायामों की स्थिति इस प्रकार है—१. हृदय कमल से प्राण स्वेच्छा से ही
बहिर्मुख हो जाता है। यह प्राण की रेचक अवस्था है। २. हृदय से बाहर निकलते समय
बारह अंगुल तक प्राण का अंगों से जो स्पर्श होता है, वह पूरक दशा है। ३. पुरुष के प्रयत्न
के बिना ही बाहर से अपान के लौटते समय, अंगों में उसके भरते समय जो स्पर्श होता है,
उसको भी पूरक ही कहते हैं। ४. अपान के हृदय में आकर विलीन हो जानेपर जब तक प्राण का
उदय नहीं होता, तब तक की अवस्था कुम्भक कहलाती है। इस अवस्था का अनुभव केवल
योगी को ही हो सकता है। इस तरह प्राण वायु शरीर के बाहर और भीतर निरन्तर स्वाभा-
विक रूप से प्राण² के आयाम के अभ्यास में निरत रहता है। प्राण की भांति अपान भी
दिन-रात शरीर के भीतर और बाहर चलता हुआ अपान के आयाम के स्वाभाविक अभ्यास

  1. बौद्ध (पालि और संस्कृत) अभिधर्म ग्रन्थों में दस अनुस्मृतियां वर्णित हैं। इनमें अन्तिम
    अनुस्मृति का नाम आनापान स्मृति है (द्रष्टव्य—अभिधम्मत्थसंगहो ९।८)। इसका संबन्ध
    प्राण और अपान की इस सूक्ष्म प्रक्रिया से ही है।
  2. "तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः" (२।४९) इस योग-सूत्र और इसके
    व्यास-भाष्य प्रभृति ग्रन्थों में प्राणायाम शब्द की विस्तृत व्याख्या देखनी चाहिये। संक्षेप
    में श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना ही प्राणायाम कहलाता है।
    श्लो० ६६ की व्याख्या में इसका अवयवार्थ स्पष्ट किया गया है। प्राणायाम शब्द की
    व्याख्या करते हुए आचार्य नरेन्द्रदेव अपने ग्रन्थ 'बौद्ध-धर्म-दर्शन' में आश्वास-प्रश्वास
    शब्द पर टिप्पणी करते हैं—"विनय की अर्थकथा के अनुसार 'आश्वास' सांस छोड़ने को