विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
by भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी
Source: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (origin)
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Read in contextविज्ञानभैरव : २३
एवं परास्वरूपे निर्णीते तदुपलब्ध्युपायजिज्ञासया श्रीदेव्युवाच—हे देवदेव
देवानां ब्रह्माद्यनाश्रितान्तानां देव स्वामिन्, त्रिशूलाङ्क स्वातन्त्र्यशक्तिस्फारितेच्छा-
द्यरात्रयात्मकत्रिशूलधारिन्, कपालकृतभूषण समस्तवाच्यवाचकात्मकजगत्खण्डरूप-
कपालैश्चैतन्यस्वातन्त्र्याभिव्यञ्जकत्वात् कृतभूषण भ्राजमानानाच्छादितस्वरूप ! भैरवस्य
'दिक्काल' (श्लो० १४) इत्यादिनाऽनुपदमुपदिष्टा दिग्देशकालशून्या व्यपदेशविवर्जिता
भरिताकारा या अवस्था उपलभ्यते, सा परा देवी कथं ज्ञाता भवेत् ? कैश्चोपायैः सा
तस्य भैरवस्य 'शैवी मुखम्' (श्लो० २०) इत्यत्र प्रतिपादितं मुखं भवेत् ? उपायैरिति
बहुवचनमुपलब्धुरणोः प्राणदेहबुद्धिशून्याश्रयोच्चारकरणध्यानवर्णस्थानकल्पनाभेदात्,
सार्वात्म्यभावनादिशुद्धविकल्पनानात्वात्, अविकल्पोपायवैचित्र्याच्च आणव-शाक्त-
शाम्भवोपायनानात्वं कटाक्षयति । हे भैरव, एतत्सर्वं यथा अहं सम्यक् प्रकारेण जानामि
तथा मे वद ।।२२-२३।।
इस तरह से परा देवी के स्वरूप का निर्णय हो जाने पर श्रीदेवी उस स्वरूप की
प्राप्ति के उपाय को जानने के अभिप्राय से पूछती है—हे देवदेव ! ब्रह्मा से लेकर अनाश्रित
पर्यन्त सभी देवताओं के स्वामी, हे त्रिशूलाङ्क ! स्वातन्त्र्य शक्ति के विस्फार (विस्तार)
स्वरूप इच्छा, ज्ञान और क्रिया—इन तीन शक्तियों के फलक वाले त्रिशूल को धारण करने
वाले, हे कपालकृतभूषण ! समस्त वाच्यवाचकात्मक जगत्खण्ड रूप कपाल में चैतन्य और
स्वातन्त्र्य की अभिव्यक्ति करने वाले अत एव सर्वत्र प्रकाशमान, निरावरण स्वरूप वाले हे
खप्परधारी भैरव ! पूर्व पश्चिम आदि दिशा, दूर-आसन्न (पास) आदि देश, वर्तमान प्रभृति
काल के परिच्छेद (इयत्ता) से रहित, नाम-रूप आदि से असंस्पृष्ट, परिपूर्ण स्वरूप वाली
भैरव की जो अवस्था उपलब्ध होती है, जिसका कि वर्णन 'दिक्काल' (श्लो० १४)
इत्यादि के द्वारा पहले भी किया जा चुका है, वह परा देवी कैसे जानी जा सकती है ? और
किन उपायों से वह 'शैवी मुखम्' (श्लो० २०) इत्यादि से प्रतिपादित शिवावस्था में प्रवेश
का द्वार बन सकती है ? उसका दर्शन किन उपायों से किया जा सकता है ? इस बात को
आप विस्तार से समझावें । उपाय शब्द में बहुवचन इस अभिप्राय से लगाया गया है कि
अपने स्वरूप की उपलब्धि में लगा जीव प्राण, देह, बुद्धि और शून्य में उच्चार, करण, ध्यान,
वर्ण और ¹स्थानकल्पना के माध्यम से आणव उपाय का, सार्वात्म्य भावना प्रभृति शुद्ध विकल्पों
के सहारे शाक्त उपाय का और निर्विकल्पात्मक नाना प्रकार के शाम्भव उपाय का सहारा
लेकर अपने सही स्वरूप को पहचान सके । देवी के प्रश्न का अभिप्राय यह है कि जिन उपायों
का सहारा लेकर मैं परा देवी और बोध(विज्ञान)भैरव के स्वरूप को ठीक से समझ सकूँ,
उनको आप विस्तार से मुझे बताइये ।।२२-२३।।
- इन पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या उपोद्घात में 'त्रिविध उपाय और समावेश' शीर्षक
के अन्तर्गत देखनी चाहिये ।