विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
by भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी
Source: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (origin)
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इस भावना के अभ्यास से साधक को अपने शिवस्वरूप का करामलकवत् (हथेली पर रखे आंवले
की तरह) साक्षात्कार हो जाता है ॥४४॥
[ धारणा-२२ ]
तनूदेशे शून्यतैव क्षणमात्रं विभावयेत् ।
निर्विकल्पं१ निर्विकल्पो निर्विकल्पस्वरूपभाक् ॥४५॥
तनूदेशे परिमितग्राहकपदे स्थूलशरीरे शून्यतैव इत्येतावन्मात्रं क्षणमल्पकालमपि
निर्विकल्पं मनः कृत्वा भावयेत् । भावनयाऽनया भावको निर्विकल्पो विकल्पातीतः सन्
निर्विकल्पस्वरूपभाक् चिद्विलासमयो जायते । शिवतत्त्वं विना न किमपि सर्वमेतत्
चिद्विलासास्पदमाश्यानतया चित्रितमिव विभातीत्येवं गन्धर्वनगरादिवत् प्रसिद्धमप्रति-
ष्ठितमिति ज्ञानेन चिदाकाशे स प्रतिष्ठितो भवतीति भावः ॥४५॥
तनूदेश अर्थात् परिमित ग्राहकता के स्थान इस स्थूल शरीर में पूर्वोक्त पद्धति से शून्यता
ही सर्वत्र विद्यमान है, इस स्थिति की एक क्षण के लिये, स्वल्प काल के लिये भी निर्विकल्प
रूप में भावना करे । इस तरह की भावना करने वाला साधक विकल्प व्यापार से ऊपर उठकर
निर्विकल्प स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, वह यह जान लेता है कि सब कुछ चित् का विलासमात्र
है । इसका अभिप्राय यह है कि शिवतत्त्व के सिवाय यहाँ कुछ भी सत् नहीं है । यह सारा
जगत् चित् का विलास मात्र है, चित्र के समान अथवा गन्धर्वनगर के समान यह केवल कल्पना
का विलास मात्र है । अतः इसकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। इस प्रकार के ज्ञान का जब
इस धारणा के अभ्यास से उदय होता है, तो वह साधक अपने स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो
जाता है ॥४५॥
[ धारणा-२३ ]
सर्वं देहगतं द्रव्यं वियद्व्याप्तं मृगेक्षणे ।
विभावयेत् ततस्तस्य भावन स्थिरा भवेत् ॥४६॥
हे मृगेक्षणे, प्रोक्तशून्यभावना यस्य न झगिति हृदयमध्यास्ते, स देहगतमस्थि-
मांसादि सर्वं द्रव्यं वियता शून्येन व्याप्तं विशेषेण भावयेत् । तदनन्तरं तस्य संयमिनः सा
भावना उपादेयशून्यवासना दृढा भवेत् । सर्वमिदं रज्जुभुजङ्गवत्, असत्यस्वरूपसाध्य-
त्वाद्वा गन्धर्वनगरादिवत् शून्यव्याप्तमित्येवं धारणया देहगतमांसादिद्रव्याणामपि
यदा शून्यताभावना दृढं प्ररूढा भवति, तदा भावकः प्रकाशमानप्रकाशो भवतीति
भावः ॥४६॥
हे मृगेक्षणे, जिसके हृदय में उक्त शून्यता की भावना सरलता से न जम सके, उसको
चाहिये कि वह अपने शरीर में विद्यमान अस्थि, मांस प्रभृति सभी धातुओं की शून्यरूप में
भावना करे कि मेरे इस स्थूल शरीर में शून्य आकाश के सिवाय कुछ भी विद्यमान नहीं है ।
१. °ल्पे-ख० ।