वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)
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Read in context( ९२ ) वेदान्तसार ।
द्विशिष्टचैतन्यलक्षणार्थस्य लक्षितत्वेपि तद्विरोधपरिहाराभा-
वादजहल्लक्षणा न संभवतीत्यर्थः ॥ ८२ ॥
( भा०टी० ) और “शोणो धावति”इस वाक्यमें जिस
प्रकार अजहत्स्वार्थ लक्षणा सङ्गत होती है तिसप्रकार
“तत्त्वमसि” वाक्य में अजहत्स्वार्थलक्षणा भी सङ्गत नहीं
है। क्योंकि “शोणो धावति” इसवाक्यमें शोण (लालरङ्ग)
गुणकी गमनक्रिया बाधित है इस कारण शोणपद शक्यार्थ
को विना परित्याग करके अर्थात् रक्तिम अर्थसहित लक्ष-
णाद्वारा शोणगुणविशिष्ट अश्वादिकमें लक्षित होता है तब
गमनक्रियाका विरोध नहीं होता है इसी कारण “शोणो
धावति” इस वाक्यमें अजहत्स्वार्थलक्षणा सङ्गत होती
है। परन्तु “तत्त्वमसि” इस वाक्य में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष
चैतन्य के प्रत्यक्ष रूप वाक्यार्थमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्षके
प्रतिपादक अंशको विरोधके कारण विरुद्ध अंशका विना
परित्याग करे लक्षणा द्वारा उसका सम्बन्धि जो कोई अर्थ
लक्षित होकर विरोध दूर नहीं होता है इसकारण अजह-
त्स्वार्थलक्षणा असङ्गत है ॥ ८२ ॥
न च तत्पदं त्वम्पदं वा स्वार्थविरुद्धांशपरित्या-
गेनांशान्तरसहितं तत्पदार्थं त्वंपदार्थं वा लक्ष-
यतु।अतः कथं प्रकारान्तरेण भागलक्षणाङ्गीकरण-
मिति वाच्यम्।एकेन पदेन स्वार्थांशपदार्थान्तरो-
भयलक्षणाया असम्भवात् पदान्तरेण तदर्थप्रती-