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वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished145 pages

Page 84 of 145

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Page 84

( ८४ ) वेदान्तसार ।
ष्टांतिके योजयति । तथात्रापीति । इहापि तत्त्वंपदयोस्तदर्थ-
योर्वा विरुद्धपरोक्षत्वापरोक्षत्वादिविशिष्टत्वपरित्यागेन तत्त्वं-
पदाभ्यां तदर्थाभ्यां वा लक्ष्याऽविरुद्धचैतन्येन सह तत्त्वंपदयो-
र्लक्ष्यलक्षणभावसंबंध इत्यर्थः।अत्र तत्त्वंपदयोः तदर्थयोश्च त्य-
क्तविरुद्धांशयोर्लक्षणत्वं अखंडचैतन्यस्य लक्ष्यत्वमिति भा-
वः। ननु तत्त्वमस्यादिवाक्यानां लक्ष्यलक्षणभावसंबंधपुरस्का-
रेण चैतन्यबोधकत्वमित्युक्तम् अन्यत्र तु शास्त्रे तेषां वा-
क्यानां भागलक्षणयैव चैतन्यबोधकत्वं प्रतिपाद्यते तत्त्व-
मस्यादिवाक्येषु लक्षणाभागलक्षणेत्यादिविरोधमाशंक्य संज्ञा-
भेदो न वस्तुभेद इत्याह । इयमेवेति । तत्त्वमस्यादिवाक्यानां
विरुद्धांशपरित्यागेनाविरुद्धचैतन्यमात्रबोधकत्वमेव भागलक्ष-
णेत्युच्यत इत्यर्थः ॥ ७८ ॥
( भा०टी० ) अब लक्ष्यलक्षणभाव सम्बन्ध दिखलाते
हैं- जैसे पहले कहेहुये “सोऽयं देवदत्तः” इसवाक्यमें “सः”
पदका अर्थ पूर्वकालमें दृष्टत्व है और “अयम्” पदका अर्थ
वर्त्तमानकालमें दृष्टत्व है इन परस्पर विरुद्ध दोनों अर्थोंका
त्याग करके केवल एक देवदत्त व्यक्ति ही लक्ष्य होता है और
“सः अयम्” ये दोनों पद लक्षण होते हैं इसकारण
लक्ष्य लक्षणभाव सम्बन्ध है । तिसीप्रकार “तत्त्वमसि” इस
वक्य में भी “तत्” पद का अर्थ अप्रत्यक्षत्व और “त्वम्”
पदका अर्थ प्रत्यक्षत्व है । इन परस्पर विरुद्ध दोनों अर्थों
का त्याग करके केवल एक अविरुद्ध चैतन्य लक्ष्य होता है