वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)
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Read in context( ७० ) वेदान्तसार ।
( सं०टी० ) अधुना पुत्रादिशून्यपर्यन्तानामात्मत्वप्रतिपा-
दकश्रुत्यादेराभासत्वात्पूर्वपूर्वमतस्योत्तरोत्तरमतबाध्यत्वाच्च दृ-
श्यत्वजडत्वादिहेतुकदंबकैश्चानात्मत्वं प्रसिद्धमेवेति प्रति-
पादयितुं प्रतिजानीते । एतेषामिति । पुत्राद्यात्मवादिना-
मतिमंदाधिकारित्वात्तत्प्रतिपादितश्रुत्यादेरपि पूर्वपूर्वस्योत्त-
रोत्तरबाध्यत्वात्पुत्रादिशून्यांतानामनात्मत्वं प्रसिद्धमेवेति प्रति-
ज्ञातमेवार्थं प्रकटयति । एतैरिति ॥ ६९ ॥
( भा०टी० ) ठीक तौ यह है । पुत्रको आदिले शून्य
पर्य्यन्त किसीको आत्मा नहीं कहा जाता है क्योंकि पुत्रादि-
कोंका अनात्मत्व स्पष्ट मालूम होता है जो पुत्रादिको आत्मा
कहे हैं वे बड़े मूढ़ हैं उनका पहले दिखाया हुआ श्रुतिप्रमाण
युक्तिप्रमाण और अनुभवप्रमाण ये सब उत्तरोत्तर दिखाये
हुए प्रमाण युक्ति और अनुमानद्वारा सबका खण्डन होजाता
है इसी कारण पूर्वोक्त मतावलम्बियोंने जो पुत्रादिको आत्मा
कहा है सो ठीक नहीं है ॥ ६९ ॥
“किञ्च प्रत्यगस्थूलो अचक्षुरप्राणो अमना अक-
र्त्ता चैतन्यं चिन्मात्रं सत्” इत्यादिप्रबलश्रुतिविरो-
धात् अस्य पुत्रादिशून्यपर्य्यन्तस्य जड़स्य चैत-
न्यभास्यत्वेन घटादिवदनित्यत्वात् अहं ब्रह्मेति
विद्वदनुभवप्राबल्याच्च तत्तच्छ्रुतियुक्त्यनुभवाभा-
सानां बाधितत्वादपि पुत्रादिशून्यपर्य्यन्तमखिल-
मनात्मैव ॥ ७० ॥