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वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished145 pages

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । (६५)
अवस्तुका आरोपस्वरूप अध्यारोप दिखलाया । अब विशेष
रूपसे जीवचैतन्यमें अध्यारोप अर्थात् कौन कौन मतावल-
म्बी किस किस वस्तुको जीवात्मा कहते हैं सो दिखाते हैं।
अति अज्ञानी पुरुष पुत्रको आत्मा कहते हैं और इस श्रुति
का प्रमाण देते हैं-“आत्माही पुत्ररूप होकर जन्म लेता है”।
परन्तु युक्तिभी आश्चर्य ढंगकी देते हैं-कहतेहैं “अपनेमें जि-
सप्रकार प्रेम होता है पुत्रमेंभी तिसीप्रकार प्रेमका अनुभव
होता है इसकारण पुत्रही आत्मा है इस विषयमें और अनु-
भवभी है जैसे पुत्रके पुष्ट होनेपर मैं पुष्ट होगया और पुत्रके
नष्ट होनेपर मैं नष्ट होगया इसप्रकार ज्ञान होता है इसकारण
पुत्रही आत्मा है”। और चार्वाक मातावलम्बी तौस्थूलशरीरको
आत्मा कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमाणभी देते हैं-“अन्न-
मय रसके विकारयुक्त यह पुरुषही आत्मा है”। और यह
युक्ति देते हैं कि “सब पुरुष पुत्रकाभी परित्याग करके जलते
हुए घरमेंसे अपने बचानेका उपाय करते हैं” और इस विषय
में अनुभवभी है. ऐसा कहते हैं क्योंकि “मैं पुष्ट हूँ मैं दुर्बल हूँ”
ऐसा ज्ञान सर्व साधारणको होता है इसकारण स्थूल शरीरही
आत्मा है दूसरे चार्वाकमतावलम्बी तौ इन्द्रियोंके समूह-
को आत्मा कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमाण देते हैं-
“इन्द्रियोंका समूह ब्रह्माके समीप जाता है तब इन्द्रियोंके न
होनेसे शरीर कुछ व्यापार नहीं कर सक्ता है” इसकारण इ-
न्द्रियसमूहही आत्मा है और यह युक्ति देते हैं “मैं अन्धा हूँ,