वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)
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Read in context( ६० ) वेदान्तसार ।
( सं०टी० ) अधुना जाग्रदवस्थायां विश्ववैश्वानरयोः त-
तद्देवताधिष्ठितश्रोत्रादिभिः चतुर्दशभिः करणैः शब्दादिविष-
यग्रहणप्रकारं दर्शयति । तदानीमिति । अस्मिन्नर्थे श्रुतिं
संवादयति । जागरितेति । जागरितं स्थानं यस्य स जागरित-
स्थानः बही रूपादौ चक्षुरादिग्राह्ये प्रज्ञा यस्य स बहिःप्रज्ञः५९
( भा०टी० ) जाग्रत् कालमें विश्व और वैश्वानर ये
दोनों दिशा वायु सूर्य्य वरुण और अश्विनीकुमार इनके द्वारा
प्रेरणा कियेहुए कर्ण त्वचा चक्षु जिह्वा और घ्राण इन पाँच
ज्ञानेन्द्रियोंकरके क्रमसे शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध इन
पाँच विषयोंका अनुभव करते हैं। इसीप्रकार अग्नि इन्द्र वि-
ष्णु यम और ब्रह्मा इनके द्वारा प्रेरणा कियेहुए वाणी पाणि
पाद पायु और उपस्थ इन पांच कर्म्मेन्द्रियों करके क्रमसे
वाक्य ग्रहण चलना त्याग और आनन्द इन पाँच बाह्य वि-
षयोंका अनुभव करते हैं और चन्द्रमा ब्रह्मा शिव और विष्णु
इन चार देवताओंके प्रेरणा कियेहुए मन बुद्धि अहंकार और
चित्त इन चार इन्द्रियों करके क्रमसे संशय निश्चय अहंकार
और चैत्त इन चार स्थूल विषयोंका अनुभव करते हैं इस
विषयमें श्रुतिभी प्रमाण है—“जाग्रत् अवस्थामें विश्व और
वैश्वानर बाह्य स्थल विषयोंका अनुभव करते हैं ” ॥५९॥
अत्राप्यनयोःस्थूलव्यष्टिसमष्ट्योस्तदुपहितयोर्वि-
श्ववैश्वानरयोश्च वनवृक्षवत्तदवच्छिन्नाकाशवच्च
जलाशयजलवत्तद्गतप्रतिबिम्बाकाशवच्च वा पूर्व-