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वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished145 pages

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ५५ )
काभी उल्लेख होजाता है पञ्चभूतके पञ्चात्मको रूपमें समान
अर्थात् मिलेहुए होनेपर प्रत्येक पञ्चभूतका अलग अलग व्य-
वहार होता है इस विषयमें न्याय प्रमाण है-“आकाशादि
पञ्चभूतमें अपने अपने अंशके आधिक्य होनेसे सर्व भूतोंका
आकाशादि नाम होता है” ॥ ५३ ॥
तदानीमाकाशे शब्दोऽभिव्यज्यते, वायौ
शब्दस्पर्शो, अग्नौ शब्दस्पर्शरूपाणि,अ-
प्सु शब्दस्पर्शरूपरसाः,पृथिव्यां शब्द-
स्पर्शरूपरसगन्धाश्च ॥ ५४ ॥
(सं०टी०) तदानीमिति । यदा पंचीकृतान्याका-
शादीनि तदानीं स्थूलत्वेन स्वकार्योत्पादनसमर्थत्वादाकाशेऽ-
व्यक्तरूपेण स्थितः शब्दः अभिव्यज्यते व्यक्तो भवतीत्यर्थः॥
(भा०टी०) पञ्चभूतके पञ्चीकरणके समय आकाशमें
शब्दगुण, वायुमें शब्द और स्पर्श, अग्निमें शब्द स्पर्श और रूप.
जलमें शब्द स्पर्श रूप और रस, पृथवीमें शब्द स्पर्श रूप रस
और गन्ध गुण प्रकाशित होतेहैं ॥ ५४ ॥
एतेभ्यः पञ्चीकृतेभ्यो भूतेभ्यो भूर्भुवःस्वर्महर्जन-
स्तपःसत्यमित्येतन्नामकानामुपर्युपरि विद्यमाना-
नामतलवितलसुतलरसातलतलातलमहातलपा-
तालनामकानामधोऽधो विद्यमानानां लोकानां ब्र-
ह्माण्डस्य तदन्तर्गतचतुर्विधस्थूलशरीराणामन्न-
पानादीनाञ्चोत्पत्तिर्भवति ॥ ५५ ॥