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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 91 of 314

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Page 91

भूमिका ७७
यहाँ इन्होंने शब्द को पौरुषेय एवं अपौरुषेय दो श्रेणियों में रखा है।
पौरुषेय लौकिक एवं अपौरुषेय वैदिकवाक्य हैं। वेदान्तदर्शन के आचार्यों ने
अपनी बात को सिद्ध करने के लिए, उसकी पुष्टि एवं समर्थन के लिए हेतु
के रूप में पद-पद पर श्रुतिवचनों को उद्धृत किया है, क्योंकि उनके मत
में श्रुति (आगम) से प्रबल एवं उत्कृष्ट कोई अन्यप्रमाण नहीं है।
अतः वेदान्त की दृष्टि में वेद (श्रुति) का स्वतःप्रामाण्य सिद्ध होता है।
इनके मत में सूर्य के प्रकाश के समान वेद स्वतःसिद्ध हैं, उन्हें प्रमाणित
करने की आवश्यकता नहीं है। स्मृति, पुराण, इतिहास आदि भी वेदसम्मत
होने से स्वतःप्रमाण की ही श्रेणी में आते हैं। वेदान्तदर्शन वेदमन्त्रों को
विभिन्नऋषियों द्वारा दर्शन किए हुए मानता है। उसके मत में वेदमन्त्र किसी
की रचना नहीं है। अतः इनके अपौरुषेय होने में संशय करना उचित नहीं
है। शङ्कराचार्य के अनुसार वेद दीपक के समान सत्य का प्रकाशन करने
वाले हैं।
(v) अर्थापत्ति- यहाँ 'अर्थापत्ति' को अलग से प्रमाणरूप में मान्यता
प्रदान की गई है। वेदान्तदर्शन के अनुसार-कार्य को देखकर उसके कारण
की परिकल्पना करना ही अर्थापत्ति कही गई है (अर्थस्य आपत्तिः
अर्थापत्तिः) अथवा प्रत्यक्षरूप में कार्य-कारण में दिखायी देने वाले विरोध
के परिहार के लिए कार्य के औचित्य की दृष्टि से अन्यकारण की
परिकल्पना को ही 'अर्थापत्ति' माना गया है।
पीनो देवदत्तः दिवा न भुङ्क्ते (देवदत्त मोटा है, किन्तु दिन में भोजन नहीं
करता है) इत्यादि वाक्य में देवदत्त का मोटापन् भोजन के अभाव में सम्भव
नहीं है। अतः प्रत्यक्षरूप से कार्य-कारण में विरोध प्रतीत होता है। इसके
परिहार के लिए अर्थौचित्य की दृष्टि से अन्यकारण 'रात्रौ भुङ्क्ते' (यदि वह
दिन में नहीं खाता तो अवश्य ही रात्रि में खाता होगा) इस अर्थ की
परिकल्पना वेदान्तियों के मत में 'अर्थापत्तिप्रमाण' का विषय है।
उनके अनुसार व्यक्ति का रात्रिभोजन प्रत्यक्षप्रमाण का विषय हो नहीं
सकता, क्योंकि उसे भोजन करते हुए किसी ने प्रत्यक्षतः देखा ही नहीं है।
साथ ही व्याप्ति के अभाव में अनुमानप्रमाण का भी यह क्षेत्र नहीं होगा।
इसीप्रकार शब्द (आगम) एवं उपमानप्रमाण भी सादृश्य आदि के अभाव में
सम्भव नहीं है। अतः इसके लिए अर्थापत्तिप्रमाण को मानना आवश्यक है।