वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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प्रत्यक्षज्ञानविषयक यह प्रक्रिया सम्पूर्ण सांसारिकपदार्थों के सम्बन्ध में
होती है। इसके विपरीत ब्रह्म-साक्षात्कार आदि के सम्बन्ध में इसमें आंशिक
भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। घटादि सांसारिकपदार्थों के अचेतन होने से उन्हें
भासित करने का कार्य चिद्वृत्ति को करना पड़ता है। जबकि ब्रह्म के स्वयं
चेतन तथा ज्योतिस्वरूप होने के कारण उसके साक्षात्कार में चिद्वृत्ति द्वारा
ब्रह्मगत अज्ञान नष्ट कर दिये जाने पर ब्रह्मतत्त्व स्वयं ही प्रकाशित हो उठता
है। इस प्रत्यक्ष में इन्द्रियों का विषय से सन्निकर्ष नहीं होता है।
इसप्रकार इन्द्रिय-सन्निकर्ष के आधार पर वेदान्तदर्शन में प्रत्यक्ष के दो
भेद कहे जा सकते हैं-(1) इन्द्रियजन्य तथा (2) इन्द्रियाजन्य। सुखदुःख
आदि का प्रत्यक्ष भी इन्द्रिय अजन्य ज्ञान (प्रत्यक्ष) की कोटि में आता है,
क्योंकि सुख-दुःख आदि भी बाह्यसांसारिकपदार्थों के समान नहीं हैं, अपितु
वे अन्तःकरण के धर्म हैं। अतः अन्तःकरण द्वारा ही उनका प्रत्यक्ष होता है।
इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि वेदान्तदर्शन में बुद्धि एवं मन को
इन्द्रिय की कोटि में नहीं रखा गया है। इसीकारण सुखदुःख का प्रत्यक्ष यहाँ
इन्द्रिय अजन्य कहा गया है।
(ii) अनुमान- वेदान्तशास्त्र की दृष्टि में दूसरा प्रमाण अनुमान है।
अनेकशः अनुमिति भी प्रमा अर्थात् यथार्थ-अनुभव (ज्ञान) का कारण बनती
है। अतः इसे प्रमाण की कोटि में रखा गया है। इसका मुख्यहेतु व्याप्तिज्ञान
को स्वीकार किया गया है। किन्हीं दो पदार्थों का दैनिकजीवन में हमेशा
एक साथ देखना तथा कभी भी विपरीतस्थिति के दर्शन न करना ही
'व्याप्ति' कहलाती है।
जिसप्रकार हम अपने दैनिकजीवन में हमेशा धूम और अग्नि के साहचर्य
के दर्शन करते हैं। अर्थात् जहाँ-जहाँ भी हमें धूम दिखायी देता है,
वहाँ-वहाँ हमें अग्नि अवश्य दृष्टिगोचर होती है। हमें ऐसा कभी भी देखने
को नहीं मिला कि धुआँ तो हो, किन्तु अग्नि वहाँ न मिली हो। इसप्रकार
का व्यभिचार (नियम का वैपरीत्य) रहित दर्शन करने पर हमारे मन में यह
बात दृढ़रूप से स्थापित हो जाती है कि 'यत्र-यत्र धूमः, तत्र तत्र वह्निः'।
दृढ़रूप में स्थापित यही सिद्धान्त, यही मान्यता दर्शन की भाषा में व्याप्ति
कहलाती है।
इसी व्याप्ति के सहयोग से जब हम एक या दो किलोमीटर की दूरी पर
स्थित पर्वत में धुआँ उठता हुआ देखते हैं तो हम निःशंक होकर कह उठते