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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 71 of 314

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भूमिका ५७
यहाँ उपाधि-वैविध्य के आधार पर जीव की प्राज्ञ, तैजस् और विश्व
तीन अवस्थाओं का उल्लेख किया है। मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान की व्यष्टि से
उपहित चैतन्य को 'प्राज्ञ- कहा गया है। इसीप्रकार सूक्ष्मशरीर की व्यष्टि से
उपहित चैतन्य को 'तैजस्' तथा स्थूलशरीर की व्यष्टि से उपहित चैतन्य को
'विश्व' संज्ञा प्रदान की गई है। जीव के इन तीन भेदों के सम्बन्ध में
आचार्य गौडपाद इसप्रकार कहते हैं-
बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तः प्रज्ञस्तु तैजसः।
घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः॥
(माण्डूक्योपनिषद्, गौडपादकारिका-1)
वेदान्तदर्शन मनोमय आदि पञ्चकोशों से विशिष्ट चैतन्य अर्थात् जीव को
कर्ता, भोक्ता एवं सुख, दुःख का अभिमानी मानता है। इस सम्बन्ध में
आचार्य शङ्कर का यह कथन उल्लेखनीय है-
“कर्तृत्वभोक्तृत्वविशिष्टजीवो मनोमयादिपञ्चकोशविशिष्टः”
(बृहदारण्यकोपनिषद् शाङ्करभाष्य 1/4/15)
अद्वैतसिद्धान्त की मान्यता के अनुसार पञ्चकोशों से आवृत होते हुए भी
यह जीवात्मा उनसे अलग है। रेशम बनाने वाले कीड़ों के समान अन्नमयादि
कोशों से आवृत होकर यह दुःख पाता है एवं इन्हीं में भटकता रहता है।
आत्मज्ञान अर्थात् अपने स्वरूप का सही-सही ज्ञान प्राप्त करने पर वह
मुक्ति (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है। अन्यथा उसे इस संसार में विविध
प्राणियों के शरीरों में (कर्मानुसार) बार-बार जन्म लेना पड़ता है। इस विषय
में विद्यारण्यस्वामी का यह कथन विशेषरूप से उल्लेखनीय है-
यथा मुञ्जादिषीकैवमात्मा युक्त्या समुद्धृतः।
शरीरत्रतीयाद्धोरैः परं ब्रह्मैव जायते॥ (पञ्चदशी-1/33)
अर्थात् जिसप्रकार मूँज से सींक युक्ति से प्रयत्नपूर्वक निकाल ली जाती
है। ठीक उसीप्रकार युक्तिपूर्वक आत्मा को शरीरत्रय एवं पञ्चकोशों से
अलग कर लेने पर जीवात्मा (जीव) परमब्रह्म हो जाता है।
(८) जीव की चार अवस्थायें- आचार्य गौडपाद ने जीव की चार
अवस्थाओं का कथन किया है-(1) जाग्रत, (2) स्वप्न (3) सुषुप्ति एवं
(4) तुरीय। यद्यपि इनका विस्तार से आगे वर्णन किया जाएगा तथापि