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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 69 of 314

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Page 69

भूमिका ५५
इसी बात को हम इसप्रकार भी कह सकते हैं कि त्रिगुणात्मिका माया
अथवा अज्ञान को शुद्ध-सत्त्वगुण की प्रधानता और अप्रधानता के आधार पर
उत्कृष्ट उपाधि एवं निकृष्ट उपाधि के रूप में जाना जा सकता है। इसी
विशुद्धसत्त्वप्रधान उत्कृष्ट उपाधिभूतसमष्टिमूलक अज्ञान से उपहित चैतन्य
(परमब्रह्म) को ईश्वर तथा निष्कृष्टोपाधिभूतव्यष्टिमूलक अज्ञान से उपहित
चैतन्य को अद्वैतवेदान्त 'जीव' मानता है। यहाँ विशुद्धसत्त्वप्रधान से अभिप्राय
रजोगुण एवं तमोगुण से अनभिभूत सत्त्वगुण की प्रधानता से ही ग्रहण करना
चाहिए।
यहाँ इसी ईश्वर को जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय का कारण माना
गया है। ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। अपनी शक्ति द्वारा यह कुछ भी करने में
समर्थ है, इसका कोई कारण नहीं है। वह अनादि है। ईश्वर की शक्ति
अलौकिक है, क्योंकि हाथ न होने पर भी वह पदार्थों को ग्रहण कर सकता
है, पैर न होने पर भी उसकी सर्वत्र गति है। वह आँख न होते हुए भी
देखता है, कान न होते हुए भी सुनता है। वह सभी पदार्थों को जानता है
किन्तु उसके यथार्थरूप को जानना अत्यन्त दुष्कर कार्य है।
सम्पूर्ण चराचररूप प्रपञ्चसमूह का साक्षीरूप में ज्ञाता होने के कारण
ईश्वर को 'सर्वज्ञ' कहा गया है। सभी जीवों को उनके कर्म के अनुसार
फल प्रदान करने वाला होने के कारण उसे सर्वेश्वर अथवा ईश्वर तथा
सभी जीवों के हृदय के अन्दर स्थित होकर बुद्धि का नियामक होने से
अन्तर्यामी तथा आनन्द की प्रचुरता होने के कारण इसे आनन्दमय कहा गया
है।
ईश्वर की अलौकिकशक्ति को अद्वैतवेदान्त में 'माया' कहा गया है।
माया की शक्ति से युक्त ईश्वर सृष्टि की रचना में समर्थ होता है। यहाँ
सृष्टि के प्रति ईश्वर को उपादान एवं निमित्तकारण दोनों माना गया है।
जिसप्रकार एक मकड़ी तन्तुकार्य के प्रति अपनी प्रधानता से निमित्तकारण
तथा अपनी उपाधि की प्रधानता से उपादानकारण होती है। उसीप्रकार ईश्वर
भी चैतन्य की प्रधानता से सृष्टि का निमित्तकारण एवं मायारूप उपाधि से
युक्त होने से उपादानकारण होता है। यह सृष्टि उत्पत्ति उसीप्रकार ईश्वर की
बृहदारण्यकोपनिषद्-3/7/15)।