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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 60 of 314

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Page 60

४६ वेदान्तसार
उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं वेदान्त के सभी ग्रन्थों में इसके इस स्वरूप को
मान्यता प्रदान की गई है। तैत्तिरीयोपनिषद् का इस विषय में स्पष्टरूप से
कथन है—“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् (3/6)। यहाँ आनन्द शब्द ब्रह्म में
आनन्द की प्रचुरता एवं पूर्णता को अभिव्यक्त करता है। बृहदारण्यकोपनिषद्
ने भी ब्रह्म की 'सर्वोच्च आनन्द' कहकर व्याख्या की है-(4/3/32)
इसके अतिरिक्त ब्रह्म के लिए 'अनन्तम्' पद का प्रयोग भी श्रुतियों ने
किया है- (सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म-तैत्तिरीयोपनिषद्-2/1/1)। अनन्त का
अभिप्राय है जिसका कोई अन्त अर्थात् सीमा न हो। अतः वह सर्वव्यापक,
नित्य एवं सर्वात्मक है।
वेदान्तदर्शन में ब्रह्म की बीजशक्ति के रूप में माया अथवा अविद्या का
उल्लेख किया गया है। इसकी उपाधि से युक्त ब्रह्म ही 'ईश्वर' कहलाता
है। यहाँ इसी ईश्वर को सम्पूर्ण चराचरजगत् की रचना का निमित्त और
उपादानकारण माना गया है। अपनी प्रधानता की स्थिति में चैतन्यरूप ब्रह्म
निमित्तकारण तथा अपनी उपाधि की प्रधानता की स्थिति में उपादानकरण
होता है। ठीक उस मकड़ी के समान जो अपने शरीर के चैतन्य के कारण
तन्तुजाल का निमित्तकारण होती है तथा शरीर से निकलने वाले तरलपदार्थ
से तन्तुजाल का निर्माण करने से उपादानकारण भी है।
यह दर्शन ब्रह्म को सर्वशक्तिमान मानता है। इसके अनुसार सृष्टि की
रचना के लिए ब्रह्म को किसी बाह्यसत्ता की आवश्यकता नहीं होती है।
मुण्डकोपनिषद् के अनुसार 'जिसप्रकार जीवितपुरुष के शरीर से केश और
रोम स्वतः उत्पन्न होते हैं, ठीक उसीप्रकार अक्षरब्रह्म से यह सम्पूर्ण
चराचरजगत् उत्पन्न होता है।¹ इस जगत् की रचना करने के पश्चात् वह
इसी में अनुप्रविष्ट हो जाता है।² इसीकारण एक होते हुए भी इसकी सभी
यहाँ भूतों, पदार्थों एवं स्थानों में अर्थात् जगत् के कण-कण में सत्ता को
स्वीकार किया गया है।³ वही यह प्राणियों के कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म का


  1. मुण्डकोपनिषद् 1/1/7
  2. तत् सृष्ट्वा तदैवानुप्राविशत् तैत्तिरीयोपनिषद् 2/6/1
  3. एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
    कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च।। (श्वेताश्वतरोपनिषद्,
    6/11)