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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 49 of 314

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Page 49

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भूमिका ३५

निरूपण), ऐतरेयोपनिषद् दीपिका (शांकरभाष्यानुसारी व्याख्या),
तैत्तिरीयोपनिषद्दीपिका (शाङ्करभाष्यानुसारी टीका), छान्दोग्योपनिषद्दीपिका
(शाङ्करभाष्यानुसारी) बृहदारण्यकवार्तिकसार (शाङ्करभाष्य पर लिखे गए
सुरेश्वराचार्यकृत वार्तिक का श्लोकबद्ध सार), शङ्करदिग्विजय (शङ्कराचार्य
जीवनचरितविषयक उत्कृष्ट काव्यरचना, कालमाधव (स्मृतिशास्त्रविषयक
ग्रन्थ)।
उपर्युक्त ग्रन्थों से इनकी सर्वतोमुखी प्रतिभा का परिचय प्राप्त होता है।
ये उच्चकोटि के राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ तत्त्वनिष्ठ एवं तपोमयीवृत्ति
के धनी थे। संन्यास ग्रहण करने के बाद ये शृंगेरीमठ के अध्यक्षरूप में भी
प्रतिष्ठित रहे।
(३५) आचार्य आनन्दगिरि—शङ्कराचार्य ने जितने भी भाष्य किए उन
सभी पर इन्होंने टीका लिखी है। भाष्यों के अभिप्राय को अभिव्यक्त करने
में इनकी टीकाएँ अत्यधिक सहायक रही हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने 'शङ्कर
दिग्विजय' नामक एक स्वतन्त्रग्रन्थ की भी रचना की। जिसकी संरचना
विद्यारण्य स्वामी की 'शङ्करदिग्विजय' के बाद की है। अतः इन्हें विद्यारण्य
स्वामी से परवर्ती तथा अप्ययदीक्षित से पूर्ववर्ती कहा जा सकता है, क्योंकि
उन्होंने सिद्धान्तलेशसंग्रह में इनकी न्यायनिर्णयटीका का उल्लेख किया है।
इस दृष्टि से इन्हें पन्द्रहवीं शती में स्थित माना जा सकता है, क्योंकि
विद्वानों ने विद्यारण्यस्वामी का समय 14वीं शताब्दी तथा अप्ययदीक्षित का
सोलहवीं शताब्दी निर्धारित किया है।
इनका दूसरा नाम आनन्दज्ञान था, यद्यपि इनके जीवन के सम्बन्ध में
अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है तथापि इतना अवश्य कहा जा सकता है
कि ये सफल टीकाकार, उन्नत दार्शनिक तथा सरल संन्यासी थे। इनके गुरु
शुद्धानन्दस्वामी थे। कुछ विद्वानों ने इन्हें शङ्कराचार्य का शिष्य भी माना है,
किन्तु कालक्रम की दृष्टि से यह समीचीन प्रतीत नहीं होता। इन्होंने
शङ्कराचार्यकृत उपनिषद्भाष्य, गीताभाष्य, शारीरकभाष्य तथा शतश्लोकी पर
वैदुष्यपूर्ण टीकाएँ लिखीं। इसके अतिरिक्त सुरेश्वराचार्यकृत तैत्तिरीयोपनिषद्-
वार्तिक तथा बृहदारण्यकोपनिषद्द्वार्तिक पर भी टीका लिखी।
(३६) प्रकाशानन्दाचार्य—इन्होंने 'वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली' ग्रन्थ की
रचना की। इनका स्थितिकाल पन्द्रहवीं शताब्दी माना गया है, क्योंकि
अप्ययदीक्षित ने सिद्धान्तलेशसंग्रह में इनके मत का उल्लेख किया है। अतः