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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 33 of 314

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भूमिका १९

अविद्या, जीव में विकार उत्पन्न करती हुई अनात्मस्वरूप अन्तःकरण में
धर्मभाव से विद्यमान रहती है।
उनके विचार में परममोक्ष प्राप्त करने से पूर्व जीव हिरण्यगर्भभाव को
प्राप्त होते हैं, जो वस्तुतः मुक्तावस्था न होकर मोक्ष की पूर्वकालीन
अवस्थामात्र है। इस अवस्था में परमात्मा का सान्निध्य हमेशा के लिए
विद्यमान रहता है। काम, वासना आदि जीव के धर्म हैं। ब्रह्म एक होने पर
भी समुद्र की तरङ्ग के समान द्वैताद्वैत है। जिसप्रकार अद्वैतभाव सत्य है,
ठीक उसीप्रकार द्वैत भी सत्य है।
(१०) आचार्य भर्तृमित्र-जयन्तभट्ट कृत न्यायमञ्जरी में पृ० 213 से
226 तक तथा यामुनाचार्य के सिद्धित्रय में पृ० 4-5 में नामोल्लेखपूर्वक
इनके सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया गया है। इसके आधार पर इन्हें
वेदान्तदर्शन का आचार्य माना जा सकता है। इनके नाम से मीमांसादर्शन पर
भी एक ग्रन्थ उपलब्ध होता है। कुमारिलभट्ट ने अपने श्लोकवार्तिक में
अनेकस्थलों पर इनके नाम का उल्लेख किया है (1/1/1/10,
1/1/6/130-131)। साथ ही टीकाकार पार्थसारथि मिश्र ने भी अपनी न्याय
रत्नाकर नामक टीका में इसीप्रकार का अभिप्राय अभिव्यक्त किया है।
कुमारिलभट्ट के अनुसार-भर्तृमित्र इत्यादि आचार्यों के अपसिद्धान्तों के
प्रभाव से मीमांसाशास्त्र लोकायतवत् हो गया। इसलिए विशिष्टाद्वैत दर्शन के
ग्रन्थों में उल्लिखित भर्तृमित्र तथा श्लोकवार्तिक में कहे गए मीमांसक
भर्तृमित्र एक ही व्यक्ति थे अथवा अलग-अलग, यह निश्चयपूर्वक कहना
अत्यन्त कठिन है, किन्तु कुमारिलभट्ट की समालोचना के आधार पर इन्हें
भिन्न व्यक्ति मानना ही उचित प्रतीत होता है। आचार्य मुकुलभट्ट ने भी
अपने 'अभिधावृत्तिमातृका' नामक ग्रन्थ में इनके नाम का उल्लेख किया है
(पृ० 17)।
(११) आचार्य भर्तृहरि-यामुनाचार्य के ग्रन्थ 'सिद्धित्रय' में इनके नाम
का भी उल्लेख किया गया है। ये प्रसिद्ध वैयाकरण थे। इन्हें महर्षि
पतञ्जलि के व्याकरण महाभाष्य का सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक
टीकाकार माना गया है। महाभाष्य पर लिखी गयी इनकी टीका 'महाभाष्य
प्रदीप' ने विद्वानों में विशिष्टस्थान प्राप्त किया। इनके नाम से वाक्यपदीय,
वाक्यपदीय के पहले दो काण्डों पर 'स्वोपज्ञटीका', वेदान्तसूत्रवृत्ति, मीमांसा