वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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यो वेदालुप्तदृष्टत्वमात्मनोऽकर्तृत्वां तथा।
ब्रह्मवित्त्वं तथा मुक्त्वा स आत्मज्ञो न चेतरः॥
(२) केनोपनिषद् में ब्रह्मज्ञानी को इसप्रकार परिभाषित किया गया है-
‘यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य य वेद सः।
अविज्ञातं विजानता विज्ञातमविजानताम्॥’
(३) ब्रह्मज्ञान के अभिमान से शून्य को ही वस्तुतः ब्रह्मज्ञानी बताया
गया है, जिसे ब्रह्मज्ञान का अभिमान है, जो 'मैं ब्रह्मज्ञानी हूँ' ऐसा कहता है,
वह व्यक्ति ब्रह्मवेत्ता हो ही नहीं सकता है।
(४) ब्रह्मवेत्ता में पवित्र-आचरण एवं पवित्र-वासनाओं की स्थिति की
पुष्टि की गयी है।
(५) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा
सकता है-
चित्र-६४
[जीवनमुक्त में अभाव]
↙ ↘
(स्वच्छन्द (उच्छृंखल) आचरण विषयक) (अहंभाव विषयक)
↓ ↓
[ब्रह्मज्ञान से पूर्व सदाचरण एवं सद्विचारों के कारण] [मैं ब्रह्मज्ञानी हूं वह ऐसा भी नहीं कहता है।]
↘ ↙
(शुभ वासनाओं का क्रम जारी) ➔ अथवा ➔ (शुभ-अशुभ के प्रति औदासीन्य)
अवतरणिका-तदनन्तर जीवन्मुक्त में स्थित रागद्वेष आदि का अभाव
एवं दया आदि गुणों को उसका अलङ्कार बताते हुए कहते हैं-
तदानीममानित्वादीनि ज्ञानसाधनान्यद्वेष्टृत्वादयः सद्गुणाश्चालङ्कारवदनु-
वर्तन्ते। तदुक्तम्-
“उत्पन्नात्मावबोधस्य ह्यद्वेष्टृत्वादयो गुणाः।
अयत्नतो भवन्त्यस्य न तु साधनरूपिण” इति॥३७॥
पदच्छेद-तदानीम् अमानित्वादीनि ज्ञानसाधनानि अद्वेष्टृत्व-आदयः सद्गुणाः
च अलङ्कारवद् अनुवर्तन्ते। तद् उक्तम्-