वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextभूमिका १५
अतः इन्हें निःसन्देह वेदान्त का आचार्य स्वीकार किया जा सकता है।
इन्होंने कार्ष्णाजिनि नामक स्मृतिग्रन्थ की भी रचना की। इसलिए इनका
उल्लेख धर्मशास्त्र के इतिहास में भी किया गया है। डॉ० पी०वी० काणे ने
मुख्य स्मृतिकार एवं उपस्मृतिकारों के अतिरिक्त 21 अन्य स्मृतिकारों में
इनके नाम की गणना करते हुए वीरमित्रोदय का उद्धरण प्रस्तुत किया है-
वसिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः।
विष्णुः कार्ष्णाजिनिः सत्यव्रतो गार्ग्यश्च देवलः॥
(परिभाषा प्र०, पृ० 18)
पैठीनसि, हेमाद्रि, माधवाचार्य आदि ग्रन्थकारों ने भी कार्ष्णाजिनि स्मृति
का उल्लेख किया है (प्राचीन चरित्रकोश-पृ० 137)। इसके अतिरिक्त
मिताक्षरा, अपरार्क, स्मृतिचन्द्रिका तथा श्राद्धविषयक अन्य ग्रन्थों में भी इनके
नाम का कथन किया गया है। राशियों के चिह्नों के विषय में इनके द्वारा
विरचित एक श्लोक अपरार्क में भी दिया गया है। (प्राचीन चरित्रकोष, पृ.
137)। ये महर्षि बादरि के मत के समर्थक रहे।
(६) आचार्य काशकृत्स्न- आचार्य जैमिनि ने अपने पूर्वमीमांसादर्शन
में इनके नाम का उल्लेख नहीं किया है, किन्तु आचार्य बादरायण ने इनके
मत का समर्थन करते हुए ब्रह्मसूत्र में एक स्थल पर (1/4/22) इनके नाम
का कथन किया है। अतः ये भी बादरायण से पूर्ववर्ती आचार्य सिद्ध होते
हैं। ये अद्वैतवादी थे। इनके अनुसार-परमब्रह्म ही जगत् का मुख्य कारण है
तथा प्रलयावस्था में यह उसी में समाविष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त
जीव ब्रह्म का विकार नहीं है, अपितु सृष्टि के समय अविकृत् ब्रह्म ही जीव
रूप में विद्यमान रहता है।
आचार्य शङ्कर ने इनके मत को श्रुतिसम्मत माना है-“काशकृत्स्नस्या-
चार्यस्य अविकृतः परमेश्वरो जीवो नान्य इति मतम् तत् काशकृत्स्नीयं मतं
श्रुत्यनुसारीति गम्यते, अतिपादयिषितार्थानुसारात् 'तत्त्वमसि' इत्यादि श्रुतिभ्यः'
(ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य-1/4/22)
(७) आचार्य जैमिनि-ये कृष्णद्वैपायन व्यास के सामवेद के शिष्य थे।
इन्होंने पूर्वमीमांसादर्शन के प्रसिद्धग्रन्थ जैमिनिसूत्र की संरचना की। ये
आचार्य बादरायण के समकालीन प्रतीत होते हैं, क्योंकि मीमांसादर्शन के
सिद्धान्तों का ब्रह्मसूत्र में तथा ब्रह्मसूत्र के सिद्धान्तों का मीमांसादर्शन में
खण्डन देखने को मिलता है। अनेकस्थलों पर मीमांसादर्शन ने ब्रह्मसूत्र के