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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २६१
प्रकरण में प्रतिपादित वस्तु का बीच-बीच में बार-बार प्रतिपादन करना
ही अभ्यास है। जैसे-वहीं (छान्दोग्योपनिषद् में) अद्वितीयवस्तु के (वर्णन
के) बीच में 'वह तू है' इसका नौ बार प्रतिपादन किया गया है। प्रकरण में
प्रतिपादित अद्वितीयवस्तु को अन्यप्रमाणों से अगम्य वर्णित करना 'अपूर्वता'
है। जैसाकि वहीं (छान्दोग्योपनिषद् में) अद्वितीयवस्तु (ब्रह्म) के सम्बन्ध में
प्रमाणान्तरों को अगम्य बताया गया है।
'चन्द्रिका'-गुरु के उपदेश के उपरान्त भी जब तक साधक को ब्रह्म
का साक्षात्कार नहीं होता, तब तक श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि
इनका प्रतिदिन अनुष्ठान करना अत्यन्त आवश्यक है। इसलिए ग्रन्थकार इसी
प्रसङ्ग में इनका उल्लेख करते हैं-
(क) श्रवण-उपक्रम-उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद एवं
उपपत्ति इन छः प्रकार के लक्षणों से सभी वेदान्तवाक्यों का एक ही
अद्वितीय परमशुद्धचैतन्यब्रह्म में तात्पर्य है, इसप्रकार समझना ही श्रवण
कहलाता है।
यहाँ ग्रन्थकार ने 'श्रवण' की व्याख्या के प्रसङ्ग में 'छः' प्रकार के
लिङ्गों का उल्लेख किया। अतः सर्वप्रथम उन छः लिङ्गों को स्पष्ट करते
हुए कहते हैं-
(१) उपक्रम-उपसंहार-किसी भी प्रकरण में जब प्रतिपादन करने
योग्य विषय के आरम्भ एवं अन्त का उचित एवं प्रभावशाली ढंग से
प्रतिपादन करना ही, क्रमशः उपक्रम एवं उपसंहार कहा जाता है। इसी बात
को उदाहरण द्वारा समझाते हैं। जैसे-छान्दोग्योपनिषद् नामक प्रसिद्ध प्रकरण
ग्रन्थ के सम्पूर्ण छठे अध्याय में वस्तुतः वेदान्त की अद्वितीयवस्तु परब्रह्म
का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया गया है। उसी का वर्णन करते हुए वहाँ
उपनिषद्कार ने एक ही अद्वैततत्त्व ब्रह्म का 'एकमेवाद्वितीयम्' इसप्रकार
उल्लेख करते हुए विषय का प्रारम्भ किया है। जिसे 'उपक्रम' संज्ञा दी जा
सकती है। इसीप्रकार वहीं अन्त में 'यह सब कुछ आत्मा का ही तत्त्व है'
(ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्) ऐसा कहकर प्रतिपाद्यविषय का भलीप्रकार उपसंहार
भी किया गया है।
(२) अभ्यास-प्रतिपादन करने योग्य अद्वितीयवस्तु परब्रह्म के
सम्बन्धित प्रकरणग्रन्थ के बीच-बीच में, बार-बार विभिन्न तरीकों से