वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextभूमिका १३
( i ) बादरायण विरचित ब्रह्मसूत्र में उल्लिखित आचार्य—महर्षि
बादरायण ने ब्रह्मसूत्र में पूर्वकालिक अनेक आचार्यों के मतों की विवेचना
उनके नामोल्लेखपूर्वक की है, किन्तु उन आचार्यों के ग्रन्थ आज उपलब्ध
नहीं हैं। इनमें आत्रेय के नाम का उल्लेख एक बार (3/4/44) आश्मरथ्य
का दो बार (1/2/19, 1/4/20), औडुलोमि का तीन बार (1/4/2, 3/4/45,
4/4/6), कार्ष्णाजिनि का एक बार (3/1/9), काशकृत्स्न का एक बार
(1/4/22), जैमिनि का ग्यारह बार तथा बादरि पराशर का चार बार
(1/2/30, 3/1/11, 4/3/7, 4/4/10) किया है। अब हम इनका संक्षेप में
विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
(2) आचार्य आत्रेय—ब्रह्मसूत्रकार ने एक स्थल पर इनके नाम का
उल्लेख करते हुए “यजमान को ही यज्ञ की अङ्गभूत उपासना का फल
प्राप्त होता है, ऋत्विक् को नहीं। इसलिए सम्पूर्ण उपासनाएँ स्वयं यजमान
को ही करनी चाहिए, पुरोहित के माध्यम से इन्हें सम्पादित नहीं कराना
चाहिए” इत्यादि मत का खण्डन आचार्य औडुलोमि के मत को प्रमाणरूप
में उद्धृत करके किया है।
आचार्य जैमिनि ने भी अपने मीमांसादर्शन में (5/2/18) आचार्य
कार्ष्णाजिनि के मत का खण्डन करने के लिए आचार्य आत्रेय के मत का
सिद्धान्तरूप में उल्लेख किया है। साथ ही उन्होंने बादरि के वैदिककर्म में
सर्वाधिकार के मत का खण्डन करने के लिए भी आत्रेय के मत को
प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है। (6/1/26) इस दृष्टि से ये मूलतः पूर्वमीमांसा
के आचार्य प्रतीत होते हैं तथा साथ ही महर्षि बादरायण से पूर्व में इनकी
स्थिति सिद्ध होती है।
बृहदारण्यकोपनिषद् 2/6/3 में इनका मांटी के शिष्यरूप में, ऐतरेय
ब्राह्मण (8/22) में अंगराज के पुरोहितरूप में इस नाम का उल्लेख हुआ
है। किन्तु ये तीनों एक ही व्यक्ति हैं अथवा अलग-अलग, इस सम्बन्ध में
निश्चितरूप से नहीं कहा जा सकता है।
( ३ ) आचार्य आश्मरथ्य—आचार्य जैमिनि ने मीमांसादर्शन में इनके मत
का उल्लेख करके उसका खण्डन किया है। अतः इन्हें निःसंदेह वेदान्त का
आचार्य स्वीकार किया जा सकता है। आश्मरथ का वंशज होने के कारण
इनका यह नाम पड़ा (प्राचीन चरित्रकोश-पृ० 63)। सूत्रग्रन्थों में भी इनके
नाम का उल्लेख मिलता है (आश्वलायन श्रौतसूत्र-6/10)। ब्रह्म के लिए