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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 268 of 314

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Page 268

२५४ वेदान्तसार
(च) अद्वय-एकत्व का सूचक।
(३) अखण्डाकार आकारितवृत्ति से अभिप्राय-अखण्डब्रह्म के स्वरूप को
धारण करने वाली, अन्तःकरण की वृत्ति से ग्रहण करना चाहिए। ब्रह्म के
अपरोक्ष एवं नित्य होने से इसीको 'साक्षात्काररूपा' भी कहा गया है।
(४) कारण के नष्ट होने पर कार्य का स्वतः ही नष्ट होना, इसे
समझाने के लिए तन्तु के नष्ट होने पर, पट का स्वतः ही नष्ट होना,
अत्यन्त सुन्दर एवं प्रासङ्गिक उदाहरण है। जो प्रायः दार्शनिकग्रन्थों में दिया
जाता रहा है। न्यायदर्शन में इसका सर्वाधिक प्रयोग हुआ है।
(५) इसीप्रकार दर्पण का उदाहरण देकर 'अहं ब्रह्मास्मि' अनुभूति में
ब्रह्म की अद्वैतरूप में स्थिति को अत्यन्त स्पष्टरूप में समझाया गया है।
(६) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझा जा सकता है-
चित्र-५५
अहं ब्रह्मास्मि
आचार्य के उपदेश के
परिणामस्वरूप
नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त,
सत्यस्वभाव, परमानन्द स्वरूप, चित्तवृत्ति का उदय
अनन्त, अद्वैत ब्रह्म के आकार
से आकारित
चित्त में स्थित अज्ञान का बाध पटकारणतन्तुदाहे पट दाहवत्
अज्ञान के विनष्ट होने पर
सृष्टि प्रपञ्च का बाध अधिकारी के चित्त में स्थित
अखण्डाकाराकारित चित्त
वृत्ति की समाप्ति
परिणामस्वरूप
प्रत्यक्-अभिन्न परमब्रह्म मात्रम् तिष्ठति दर्पणाभावे मुख प्रतिबिम्बस्य
मुखमात्रत्ववत्।
अवतरणिका-इसी प्रसङ्ग को आगे बढ़ाते हुए श्रुतिवाक्यों से प्रमाणित
करते हैं-