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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 260 of 314

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Page 260

२४६ वेदान्तसार
में स्थित अल्पत्वादि विशिष्ट जीवरूप चैतन्य को लक्षणा द्वारा बोधित करा
सकता है।
इसीप्रकार त्वम् पद भी 'तत्' पद के विरुद्ध अपने अपरोक्षत्वादिधर्म का
परित्याग करके तथा दोनों में समानरूप से स्थित चैतन्यांश को न छोड़ता
हुआ, तत् पद के सर्वज्ञत्व आदि विशिष्ट ईश्वररूपचैतन्य को लक्षणा द्वारा
बोधित करा सकता है। इसलिए यहाँ 'भागलक्षणा' को मानने की
आवश्यकता नहीं है, तो यह भी संगत नहीं है।
क्योंकि एक ही तत् अथवा त्वम् पद परित्याग किए हुए अपने
परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादि रूप अर्थ को तथा दूसरे पद के अर्थ को भी एक
साथ लक्षणा द्वारा बोध कराएँ, ऐसी उभयलक्षणा ठीक उसीप्रकार नहीं होती
है, जैसे-शोणो धावति में प्रयुक्त 'शोण' पद अपने लाल अर्थ को बताने के
साथ-साथ लक्षणा से काले, नीले, पीले आदि रंगों का कथन नहीं करता
है।
इसके अलावा यहाँ तत् एवं त्वम् दोनों पदों का प्रयोग हुआ ही है।
अतः उन्हीं के द्वारा अपने-अपने अर्थों की अभिधा शब्दशक्ति से
स्वतःप्रतीति हो ही जाएगी। इसलिए लक्षणा द्वारा दूसरे पद से, अन्य पद के
अर्थ की प्रतीति कराने की कोई आवश्यकता नहीं है।
विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार ने 'शोणो धावति' के समान
'तत्त्वमसि' वाक्य में अजहल्लक्षणा के अनौचित्य का प्रतिपादन किया है।
(2) लक्षणा दो प्रकार की होती हैं (क) जहल्लक्षणा इसीको लक्षण
लक्षणा भी कहते हैं (ख) अजहल्लक्षणा इसे उपादानलक्षणा भी कहा जाता
है।
(3) 'तत्त्वमसि' वाक्य में प्रयुक्त 'तत्' एवं 'त्वम्' पदों के उभय
सामान्यधर्म की प्रतीति कराने के लिए ग्रन्थकार ने उक्त दोनों लक्षणाओं से
भिन्न जहदजहल्लक्षणा की परिकल्पना की है, जिसे भागलक्षणा भी कहा
जाता है।
(4) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते
हैं-