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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 251 of 314

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Page 251

महावाक्यार्थ-निरूपण २३७
द्रव्य का, अंपने से भिन्न श्वेत आदि गुणों एवं पट आदि द्रव्यों से भिन्नता
रखने के कारण, परस्पर विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध तथा एक से विशिष्ट
दूसरे अथवा उन दोनों के भेदरूप वाक्यार्थ को स्वीकार करने पर
(प्रत्यक्षादि) अन्य प्रमाणों से विरोध के अभाव में (नील अभिन्न कमल)
रूप वाक्यार्थ संगत हो जाता है।
(जबकि) यहाँ तो 'तत्' पद के अर्थ 'परोक्षत्वादि गुणों से विशिष्ट
चैतन्य' एवं त्वम् पद के अर्थ 'अपरोक्षत्वादिगुण विशिष्टचैतन्य' का परस्पर
भेदकत्त्व होने से विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध का, एक से विशिष्ट दूसरे
अथवा उन दोनों के भेदरूप वाक्यार्थ के भाव को स्वीकार करने पर,
प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के विरोध के कारण वाक्यार्थ संगत नहीं होता है।
इसीलिए कहा भी गया है-
(तत्त्वमसि महावाक्य में) संसर्ग अथवा विशेषणविशेष्यभाव द्वारा वाक्य
का अर्थ करना उचित नहीं है, (अपितु) विद्वानों के (मतानुसार यहाँ)
अखण्ड एकरस ही (तत्त्वमसि) महावाक्य का अर्थ है।
'चन्द्रिका'-ग्रन्थकार 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य में प्रयुक्त होने वाले
सामानाधिकरण्य, विशेषणविशेष्यभाव एवं लक्ष्यलक्षणभाव सम्बन्धों को स्पष्ट
करने के पश्चात् कहते हैं कि यहाँ 'नीलमुत्पलम्' इस वाक्य के समान
'विशेषणविशेष्यभाष्य' की परिकल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि
'नीलमुत्पलम्' इस वाक्य में नील गुण है तथा उत्पल गुणी अर्थात् द्रव्य है।
इसप्रकार गुण एवं गुणी इन दोनों का विशेषणविशेषणभावसम्बन्ध अथवा
'जो नील गुण की विशेषता लिए हुए है, यह वही कमल है', इसप्रकार इन
दोनों के विशेष वाक्यार्थ को स्वीकार करने में किसीप्रकार का कोई विरोध
नहीं है, क्योंकि यहाँ सम्बन्ध एवं विशिष्टवाक्यार्थ दोनों की अन्विति पूर्णरूप
से उचित है। साथ ही प्रत्यक्षादिप्रमाणों से भी इस वाक्यार्थ की पुष्टि होती
है। अतः नीलम् उत्पलम् में यह विशेषणविशेष्य सम्बन्ध करना संगत है।
जबकि 'तत्त्वमसि' इस वाक्य में 'तत्' एवं 'त्वम्' दोनों ही द्रव्य हैं। इस
कारण यहाँ पूर्ववत् विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध अथवा विशिष्टवाक्यार्थ दोनों
ही सम्भव नहीं हैं, क्योंकि यहाँ प्रयुक्त 'तत्' पद का अर्थ परोक्षत्वादिगुण
विशिष्ट चैतन्य एवं 'त्वम्' पद का अपरोक्षत्वादिगुणविशिष्ट चैतन्य अर्थ है।