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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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Page 241

' अपवाद-निरूपण २२७
इसके अतिरिक्त अपने स्वरूप का परित्याग न करते हुए जब किसी
वस्तु में अन्य वस्तु की मिथ्याप्रतीति होती है, तो इस प्रक्रिया को हम
'विवर्त' कहेंगे। जैसे रस्सी में सर्प की प्रतीति होना, सीपी में चांदी की
भ्रान्ति होना विवर्त है, क्योंकि इन दोनों स्थानों पर रस्सी एवं सीपी अपने
स्वरूप का परित्याग किए बिना ही अन्यरूप को ग्रहण कर लेती हैं। यद्यपि
यह रूप भ्रान्ति ही है, फिर भी इसके, क्षणिक ही सही, अस्तित्व को
नकारा नहीं जा सकता है।
ठीक इसीप्रकार चराचररूप सम्पूर्णप्रपञ्च शुद्धचैतन्यस्वरूप परमब्रह्म का
विवर्त है परिणाम नहीं, क्योंकि सत्यवस्तु ब्रह्म में प्रपञ्च की प्रतीति वस्तुतः
मिथ्या है। ज्ञान आदि द्वारा इस मिथ्याप्रतीति को दूर करके तुरीयचैतन्य ब्रह्म
' की तात्त्विकप्रतीति होना ही 'अपवाद' है।
जब प्रमाता को इस बात का भलीप्रकार ज्ञान हो जाता है तो यह सम्पूर्ण
चराचरप्रपञ्च अपनी उत्पत्ति के विपरीतक्रम में अपने-अपने कारणों में
विलीन होता जाता है। इसप्रकार वह मिथ्याप्रतीति विनष्ट हो जाती है तथा
अन्त में अद्वैतब्रह्म की सत्ता विद्यमान रहती है, जिसे 'तुरीय' संज्ञा भी प्रदान
की गई है, क्योंकि यह स्थूलप्रपञ्च, सूक्ष्मप्रपञ्च एवं कारणशरीर से भिन्न
अर्थात् चतुर्थ होता है। वेदान्त की दृष्टि में साधक की यही सर्वोत्कृष्ट
स्थिति है।
ज्ञान होने के अनन्तर सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च के अपने-अपने कारण में
विलय होने के क्रम को ग्रन्थकार ने 'तथाहि' इत्यादि गद्यांश में वर्णित
किया है-
सुख-दुःख आदि को भोगने वाले जरायुज, अण्डज, स्वेदज और
उद्भिज्ज नामक चार प्रकार के सभी स्थूलशरीर, अन्नपान आदि सभी
भोग्यपदार्थ, भूः भुवः स्वः, महः, जनः तपः और सत्यम् ये सात ऊर्ध्व
लोक तथा अतल, वितल, सुतल, रसातल, महातल एवं पाताल आदि सात
अधःलोक इसप्रकार कुल मिलाकर चौदहभुवन एवं इन सबका आधारभूत
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, ये सभी अपने कारणरूप पञ्चीकृतमहाभूतों आकाश, वायु,
अग्नि, जल और पृथ्वी में विलीन हो जाते हैं।
तत्पश्चात् अपने शब्दादिगुणों सहित सभी पञ्चीकृतमहाभूत एवं सत्रह
अवयवों से युक्त सूक्ष्मशरीर ये सभी अपने कारणरूप अपञ्चीकृतभूतों में
विलीन हो जाते हैं। उसके बाद ये अपञ्चीकृतभूत भी अपने-अपने कारण में
उल्टेक्रम से इसप्रकार विलीन होते हैं-'पृथिवी जल में, जल अग्नि में,