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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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भूमिका ९
इसी सूक्त के अग्रिम मन्त्र में प्रयुक्त ‘सत्’ को विद्वानों ने ‘सत्त्व’ गुण
के अर्थ में प्रयुक्त माना है–
सतो बन्धुमसति निरविन्दन् (ऋ. 10/129/4)
इसके अतिरिक्त ‘पुरुष एवेदं सर्वम्’ (ऋ. 10/90/2) तथा ‘यो
अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्’ इत्यादि मन्त्रों में सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी,
सत्यस्वरूप, प्रकाशमय, आनन्दस्वरूप ईश्वर अथवा ‘ब्रह्म’ के दर्शन भी
किए जा सकते हैं। इसप्रकार सूक्ष्मरूप से अन्वेषण करने पर ऋग्वेद के
मन्त्रों में अनेकस्थलों पर वेदान्त के सिद्धान्तों एवं तत्त्वों को मूलरूप में
सहज ही देखा जा सकता है। इसी आधार पर यह भी कहा जा सकता है
कि वेदान्त के सिद्धान्तों का पल्लवन संहिता एवं उपनिषद्काल के बीच
ब्राह्मणग्रन्थों के समय में हुआ होगा, तभी उपनिषदों तक आते-आते हमें
इस दर्शन का परिष्कृत एवं व्यवस्थितरूप देखने को मिलता है। जिसका हम
आगे संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं–
(ङ) उपनिषदों में वेदान्तदर्शन–उपनिषद् अध्यात्मविद्या अथवा
ब्रह्मविद्या को कहते हैं। वेद का अन्तिम भाग होने से इसे वेदान्त भी कहा
जाता है। ‘वेदान्तो नाम उपनिषत्प्रमाणम्’ परिभाषा के अनुसार उपनिषदों को
प्रमाणरूप में मानकर चलने वाला शास्त्र वेदान्तदर्शन माना गया है। इस दृष्टि
से उपनिषदों का स्वतः ही महत्त्व सिद्ध हो जाता है। उपनिषद् शब्द से
ज्ञानकाण्ड के विशाल दार्शनिकसाहित्य का बोध होता है। जिसकी सृष्टि
वैदिक कर्मकाण्ड की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप हुई।
उपनिषद् शब्द ‘उप’ एवं ‘नि’ उपसर्गपूर्वक सद् धातु से क्विप् प्रत्यय
करके निष्पन्न हुआ है। अतः अर्थ की दृष्टि से भी यह शब्द वेदान्तदर्शन
के लक्ष्य को ही इंगित करता है, क्योंकि इनके अनुशीलन से मुमुक्षुओं की
संसारबीजरूपी अविद्या नष्ट हो जाती है तथा मनुष्य के गर्भवास, जन्म,
जरा, मृत्यु आदि विषयक दुःख सर्वथा शिथिल हो जाते हैं और उसे ब्रह्म
की प्राप्ति होती है। इस दृष्टि से उपनिषद् एवं वेदान्तदर्शन को अभिन्न माना
जा सकता है। इसीकारण वेदान्तदर्शन का प्रतिपादन करते हुए विद्वान्
आचार्यों ने पदे-पदे उपनिषद्वाक्यों को प्रमाणरूप में उद्धृत किया है।
अब प्रश्न उठता है कि प्राप्त उपनिषदों की संख्या तो 220 के लगभग
है तो क्या सभी में वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों का उल्लेख हुआ है? इस
सम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि उपलब्ध उपनिषदों में से