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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 228 of 314

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Page 228

२१४ वेदान्तसार
में प्रतिबिम्बित होने वाले आकाश के समान, तात्त्विकदृष्टि से किसी भी
प्रकार की कोई भिन्नता नहीं होती है।
कहने का तात्पर्य यह है कि जिसप्रकार अलग-अलग वनों से अवच्छिन्न
आकाश हमें स्थूलदृष्टि से देखने पर भिन्न-भिन्न दिखायी देते हैं तथा
जिसप्रकार अलग-अलग जलाशयों में प्रतिबिम्बित आकाश भी हमें स्थूल-
दृष्ट्या अलग-अलग ही प्रतीत होते हैं, किन्तु उनमें तात्त्विकदृष्टि से कोई
भेद नहीं होता है। ठीक उसीप्रकार कारणशरीर, सूक्ष्मशरीर एवं स्थूलशरीर
की समष्टिव्यष्टि से उपहित चैतन्य भी स्थूलदृष्टि से ही क्रमशः ईश्वर प्राज्ञ,
सूत्रात्मा, तैजस् एवं वैश्वानर, विश्वरूप में अलग-अलग प्रतीत होते हैं,
जबकि तात्त्विकदृष्टि से इनमें कोई भेद नहीं होता है।
पुनः 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' रूप महावाक्य के वाच्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ को
कहते हैं-
इस महाप्रपञ्च तथा उससे उपहित चैतन्य से अभिन्न होकर परमशुद्ध
चैतन्य 'सर्वं खलु इदं ब्रह्म' इस महावाक्य का वाच्यार्थ होता है तथा वही
अलग-अलग होने की स्थिति में लक्ष्यार्थ भी होता है। कहने का तात्पर्य यह
है कि जिसप्रकार एक लोहे के गोले को अग्नि में डालने पर वह तपकर
लाल हो जाता है तथा उससे जलने पर 'मैं लोहे से जल गया' इसप्रकार
कहा जाता है, जबकि जलाने की शक्ति लोहे में न होकर अग्नि में होती
है। यहाँ अग्नि के सम्पर्क में आने पर लोहे और अग्नि का परस्पर तादात्म्य
सम्बन्ध होने अर्थात् अत्यधिक नैकट्य होने से वे दोनों हमें एक प्रतीत होते
हैं, जबकि होते वे दोनों अलग-अलग हैं।
उसीप्रकार महाप्रपञ्च एवं उससे अवच्छिन्नचैतन्य के साथ परस्पर
तादात्म्य की प्रतीति होने से प्रतीत होने वाला उपाधिशून्य शुद्धचैतन्य ही
'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' महावाक्य का अभिधा शब्दशक्ति से प्रतीत होने वाला
सीधा अर्थ अर्थात् वाच्यार्थ है। इसके अतिरिक्त उक्त महाप्रपञ्च एवं उससे
उपहितचैतन्य के परस्पर आभासित होने वाली तादात्म्य की प्रतीति से शुद्ध
चैतन्य को अलग मानने पर वही 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' रूप महावाक्य का
लक्ष्यार्थ हो जाता है।
कहने का अभिप्राय यह है कि जिसप्रकार 'अयो दहति' लोहा जलाता
है, इत्यादि वाक्य में लोहे में जलाये जाने की क्षमता न होने से मुख्य अर्थ
(वाच्यार्थ) का बाध हो जाता है तथा लक्षणा शब्दशक्ति से तत्सम्बद्ध अन्य
अर्थ की प्रतीति-'लोहे में स्थित अग्नि जलाती है' इस रूप में होती है, जो