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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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१९८ वेदान्तसार
में उसके अन्दर विद्यमान रहते हैं। उन्हीं भावों को वह स्वप्नावस्था में
अनुभव करता है। इसके अलावा प्रलयकाल की अवस्था में सम्पूर्ण स्थूल
प्रपञ्च का विलय भी इसी सूक्ष्मशरीर में होता है। इसलिए इसे 'लयस्थान'
भी कहा जाता है।
इसके अतिरिक्त तेजोमय अन्तःकरण से विशिष्ट, अलग-अलग
सूक्ष्मशरीर से उपलक्षित चैतन्य की 'तैजस्' संज्ञा होती है। समष्टि के समान
ही यह भी स्थूलशरीर की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण 'सूक्ष्मशरीर',
विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय इन तीन कोशों से युक्त होने से 'कोशत्रय'
तथा चैतन्य द्वारा अनुभव की गई स्थूलशरीर सम्बन्धित वासनाओं से युक्त
होने से 'स्वप्न' तथा स्थूलशरीर का लय होने से 'लयस्थान' कहलाती है।
सूत्रात्मा और तेजस् ये दोनों सूक्ष्ममनोवृत्तियों द्वारा स्थूलशरीर में अनुभव
किए गए वासनामय शब्दादि विषयों का स्वप्नावस्था में भी ठीक उसीप्रकार
अनुभव करते हैं, जिसप्रकार ईश्वर और प्राज्ञ अज्ञान की सूक्ष्मवृत्तियों द्वारा
सुषुप्ति अवस्था में भी आनन्द का अनुभव करते हैं। अपने कथन की पुष्टि
में ग्रन्थकार श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं, जिसका पूर्णवाक्य
इसप्रकार है-
'स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्गः एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तेजसः'
अर्थात् बाह्यविषयों से असम्बद्ध 'तैजस्' संज्ञा वाला चैतन्य स्वप्नावस्था
में भी अपने सात अंगों एवं उन्नीस मुखों से वासनामय सूक्ष्मशब्द आदि
विषयों का उपभोग करता है। यहाँ उन्नीस मुखों से अभिप्राय पञ्च
ज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चप्राण तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार कुल
उन्नीस तत्त्वों से है तथा सात अंग-अग्नि, सूर्य, चन्द्र, वायु, वेद, दिशा,
आकाश तथा पृथिवी को माना गया है।
इसप्रकार यहाँ भी विज्ञानमय आदि कोशत्रय की समष्टि तथा उससे
उपहित सूत्रात्मारूप चैतन्य की तथा इसी की व्यष्टिरूप विज्ञानमय आदि
कोशत्रय तथा उससे अवच्छिन्न तैजस् संज्ञा वाले चैतन्य की, ठीक
उसीप्रकार अभिन्नता मानी गयी है, जैसे-वन एवं वृक्ष तथा उनसे अवच्छिन्न
आकाश में अभिन्नता होती है। इसीप्रकार जैसे-जल एवं जलाशय तथा
उनमें प्रतिबिम्बित आकाश में ऐक्य है।
अतः सूत्रात्मा एवं तैजस् इन दोनों का भेद समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि
से नाममात्र का भेद है। वास्तविकदृष्टि से समष्टि एवं व्यष्टि तथा उनमें
स्थित सूत्रात्मा एवं तैजसरूप चैतन्य वस्तुतः एक ही हैं। इसप्रकार