Skip to content
SarvaKosh
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 190 of 314

Read in context
Page 190

१७६ वेदान्तसार
अवतरणिका-इसी प्रसङ्ग को आगे स्पष्ट करते हुए विक्षेप शक्ति के
कार्य को प्रदर्शित करते हैं-
अनयैवावरणशक्त्यावच्छिन्नस्यात्मनः कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखदुःख-
मोहात्मकतुच्छसंसारभावनापि सम्भाव्यते यथा स्वाज्ञानेनावृतायां रज्ज्वां
सर्पत्वसम्भावना। विक्षेपशक्तिस्तु यथा रज्जुज्ञानं स्वावृतरज्जौ स्वशक्त्या
सर्पादिकमुद्भावयत्येवमज्ञानमपि स्वावृतात्मनि विक्षेपशक्त्याकाशादि-
प्रपञ्चमुद्भावयति तादृशं सामर्थ्यम्। तदुक्तम्-
"विक्षेपशक्तिर्लिङ्गादि ब्रह्माण्डान्तं जगत्सृजेद्” त्ति॥१०॥
पदच्छेद- अनया एव आवरणशक्त्या अवच्छिन्नस्य आत्मनः कर्तृत्व
भोक्तृत्व सुख-दुःख-मोहात्मक-तुच्छसंसारभावना अपि सम्भाव्यते, यथा-स्व
अज्ञानेन आवृतायाम् रज्ज्वाम् सर्पत्व सम्भावना।
विक्षेपशक्तिः तु यथा रज्जु-अज्ञानम् स्व-आवृतारज्जौ स्वशक्त्या
सर्पादिकम् उद्भावयति। एवम् अज्ञानम् अपि स्व-आवृत-आत्मनि-विक्षेप
शक्त्या आकाशादि-प्रपञ्चम् उद्भावयति, तादृशम् सामर्थ्यम्। तद् उक्तम्-
"विक्षेपशक्तिः लिङ्गादि ब्रह्माण्ड-अन्तम् जगत् सृजेद् इति ।।10।।
अनुवाद-इसी आवरणशक्ति द्वारा आच्छादित आत्मा की कर्तृत्व,
भोक्तृत्व, सांसारिक सुख-दुःख-मोहात्मकता-विषयक तुच्छभावना भी अपने
अज्ञान से आच्छादित रस्सी में सर्पत्व की सम्भावना के समान आरोपित
होती है।
विक्षेपशक्ति तो वैसी ही सामर्थ्यसम्पन्न है, जिसप्रकार रस्सी विषयक
अज्ञान अपनी शक्ति द्वारा आवृत रस्सी में सर्प आदि की उद्भावना करता
है। उसीप्रकार (आत्मविषयक) अज्ञान भी अपनी विक्षेपशक्ति द्वारा आवृत
आत्मा में (सूक्ष्मशरीर से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त) आकाश आदि प्रपञ्च को
उद्भावित कर देता है। इसीलिए कहा गया है-"विक्षेपशक्ति ही सूक्ष्मशरीर
आदि सृष्टि से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त संसार का सृजन करती है।"
'चन्द्रिका'-तत्पश्चात् अज्ञान की प्रथम 'आवरण' नामक शक्ति के
अन्य कार्य को कहते हैं-अज्ञान की इसी आवरणशक्ति से युक्त शुद्ध
चैतन्यरूप आत्मा अपने आपको नामरूपात्मक संसार के भोगादिविषयों का
कर्ता, भोक्ता तथा उनसे प्राप्त होने वाले सुख एवं दुःख आदि को अनुभव
करके स्वयं को भी सुखी दुःखी आदि मानने लगता है। जबकि वास्तविक-