वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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'चन्द्रिका'- जिस अज्ञान के स्वरूप एवं समष्टिव्यष्टिविषयक दो भेदों
का अभी तक उल्लेख किया गया है। उसकी आवरण एवं विक्षेप नामक
दो शक्तियाँ होती हैं। इसमें आवरणशक्ति द्रष्टा की दृष्टि के आगे एक
आवरण डाल देती है। इससे देखने वाला सामने स्थित वस्तु के स्वरूप को
नहीं देख पाता है। इसे अत्यन्त सुन्दर उदाहरण द्वारा समझाते हैं-
जैसे-आकाश में बादल का एक छोटा-सा टुकड़ा अनेक योजन विस्तार
वाले सूर्य के सामने आकर उसे आच्छादित कर लेता है। जिसे देखकर
सामान्यतया व्यक्ति यही अनुमान लगाता है कि बादल ने सूर्य को ढक
लिया है, जबकि वास्तव में यह पूर्णतया असम्भव है, क्योंकि करोड़ों योजन
विस्तार वाला सूर्य किसी भी स्थिति में बादल द्वारा आच्छादित नहीं किया
जा सकता है।
ठीक उसीप्रकार सीमित अज्ञान भी अपनी आवरण नामक शक्तिविशेष
द्वारा जिसकी कोई सीमा नहीं है अर्थात् निस्सीम, जिसका कभी जन्म नहीं
होता अर्थात् अजन्मा, सांसारिक समस्तवस्तुओं से भिन्न आत्मा को आवृत
सा कर लेता है। इसकारण सामान्य बुद्धिवाला व्यक्ति आत्मा को देख नहीं
पाता है।
वास्तव में आत्मा नित्योपलब्धि स्वरूप वाला, सच्चिदानन्द है, देश, काल
आदि की सीमाओं से परे है। अतः किसी भी वस्तु द्वारा उसे ढकना पूर्णरूप
से असम्भव है। इसके अतिरिक्त उसे कभी भी संसार का कोई बन्धन
बांधने में समर्थ नहीं है, किन्तु अज्ञानी व्यक्ति उसे बंधा हुआ सा मानता है।
वस्तुतः आत्मा के वास्तविक स्वरूप को ढकने में अज्ञान की आवरण
शक्ति ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती है। अपने कथन की पुष्टि में
ग्रन्थकार 'घनच्छन्नदृष्टि' इत्यादि कारिका को उद्धृत करते हैं। इस कारिका
का भी यही अभिप्राय है जो उक्त गद्यखण्ड में प्रतिपादित किया गया है-
जिसप्रकार किसी छोटे से बादल के टुकड़े से आच्छन्नदृष्टि वाला
मूर्खबुद्धि व्यक्ति यह समझता है कि बादल ने सूर्य को ढक लिया इस
कारण सूर्य प्रकाशरहित हो गया। इसलिए सर्वत्र अंधकार का साम्राज्य हो
गया। ठीक उसीप्रकार मूढ़बुद्धि अज्ञानीजन नित्य, सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा
को जन्म-मरण आदि अनेक बन्धनों में आबद्ध मान लेते हैं। जबकि
वास्तविकता यह है कि यह आत्मा नित्य, शुद्धबुद्ध एवं प्रकाशक है। इसकी
कोई सीमा नहीं है। यह स्थान एवं समय की सीमाओं से परे है। इसे दैनिक
व्यवहार में लोग 'अहम्' इस शब्द द्वारा प्रयोग करते हैं।