वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextअज्ञान निरूपण १६३
तमोगुण द्वारा सत्त्वगुण के अभिभूत होने के कारण व्यष्टिरूप उपाधि को
‘अस्पष्ट’ कहा गया है। ठीक उसीप्रकार जैसे दर्पण धूलकणों से आच्छादित
होकर अस्पष्ट प्रतिबिम्ब वाला हो जाता है, क्योंकि निकृष्ट उपाधिभूत
अज्ञान के मलिन होने के कारण उसमें चिद्स्वरूप ब्रह्म का प्रतिबिम्ब स्पष्ट
प्रतीत नहीं होता है। यही इसका अज्ञत्व है। इसीको वेदान्त ने चिदाभास भी
कहा है।
तत्पश्चात् ग्रन्थकार व्यष्टिगत अज्ञान अर्थात् जीव की दृष्टि से भी सृष्टि
के विकास की प्रथम दशा का कथन करते हुए कहते हैं कि-निकृष्ट
उपाधियुक्त यह व्यष्टि वेदान्त की दृष्टि से अहंकार आदि का कारण होने
से ‘कारणशरीर’ कहलाती है। यहाँ प्रयुक्त अहंकार से अभिप्राय अन्तःकरण
से ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि सुषुप्ति अवस्था में अन्तःकरण ही अज्ञान में
विलीन होता है।
आनन्द की अधिकता एवं शुद्धचैतन्य को गोलक अर्थात् कोश के समान
ढक लेने से यही आनन्दमयकोश भी कहलाता है, क्योंकि सुषुप्तिकाल में
जीव, स्वप्न एवं जाग्रत दोनों के विलीन होने पर एकमात्र सुख का ही
अनुभव करता है। कैवल्योपनिषद् का भी इस विषय में कथन है-
‘सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमोऽभिभूतः सुखरूपमेति’
इसीप्रकार सभी का उपरमण होने के कारण इसे सुषुप्ति एवं समस्त
दृश्यमान स्थूलप्रपञ्च का एवं न दिखायी देने वाले सूक्ष्मप्रपञ्च का लयस्थान
होने के कारण इसीको ‘लयस्थान’ संज्ञा द्वारा भी अभिहित किया जाता है।
विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में व्यष्टि की दृष्टि से अज्ञान एवं उसकी
सृष्टि पर विस्तारपूर्वक विचार किया गया है।
(2) जिसप्रकार अज्ञान की समष्टिरूप ईश्वर कारणशरीर, आनन्दमय
कोश, सुषुप्ति एवं लयस्थान आदि कहलाता है। ठीक उसीप्रकार व्यष्टिरूप
अज्ञान में भी निकृष्ट उपाधि होने पर भी वही स्थितियां आती हैं, क्योंकि
इन दोनों में चैतन्यरूपतत्त्व एक ही रहता है। उपाधि की उत्कृष्टता एवं
निकृष्टता के कारण ही अन्तर दिखायी देता है।
(3) जाग्रत एवं स्वप्नावस्था में व्यक्ति को सुख के साथ-साथ दुःख
की अनुभूति भी होती है, किन्तु सुषुप्ति में केवल सुख का अनुभव होता
है।