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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 174 of 314

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Page 174

१६० वेदान्तसार
कारणशरीरमानन्दप्रचुरत्वात्कोशवदाच्छादकत्वाच्चानन्दमयकोशः, सर्वो-
परमत्वात्सुषुप्तिरत एव स्थूलसूक्ष्मशरीरप्रपञ्चलयस्थानमिति चोच्यते॥७॥
पदच्छेद-यथा वनस्य व्यष्टि-अभिप्रायेण वृक्षाः, इति अनेकत्व व्यपदेशः।
यथा वा जलाशयस्य व्यष्टि-अभिप्रायेण जलानि, इति। तथा अज्ञानस्य
व्यष्टि-अभिप्रायेण तद्-अनेकत्व व्यपदेशः “इन्द्रः मायाभिः पुरुरूप ईयते"
इत्यादि श्रुतेः। अत्र व्यस्तसमस्तव्यापित्वेन व्यष्टिसमष्टिता व्यपदेशः।
इयम् व्यष्टिः निकृष्ट-उपाधितया मलिनसत्त्वप्रधाना। एतद् उपहितम्
चैतन्यम्-अल्पज्ञत्व, अनीश्वरत्व आदिगुणकम् प्राज्ञः इति उच्यते, एक-अज्ञान
अवभासकत्वात् अस्य प्राज्ञत्वम् अस्पष्ट-उपाधितया अनतिप्रकाशत्वात्। अस्य
अपि इयम् अहंकार-आदिकारणत्वात्-कारणशरीरम्। आनन्दप्रचुरत्वात्
कोशवद् आच्छादकत्वात् च आनन्दमयकोशः। सर्वोपरमत्वात् सुषुप्तिः, अतः
एव स्थूल-सूक्ष्मशरीरप्रपञ्च-लयस्थानम् इति च उच्यते।।7।।
अनुवाद-जिसप्रकार वन के (वृक्षों में) व्यष्टि के अभिप्राय से 'वृक्ष'
यह अनेकतासूचक व्यवहार होता है। अथवा जिसप्रकार जलाशय के (जल
के लिए) व्यष्टि की दृष्टि से अनेकजल इसप्रकार (कहते हैं।) उसीप्रकार
अज्ञान के व्यष्टिगतभेद को प्रदर्शित करने के अभिप्राय से उस (अज्ञान) की
अनेकता का व्यवहार होता है। 'अज्ञानों के कारण आत्मा (इन्द्र) बहुत रूपों
में प्रतीत होता है' इत्यादि श्रुति का वचन भी (इसमें प्रमाण है)। यहाँ
व्यष्टिगत एवं समष्टिगत व्यापकता के कारण ही अनेकता (व्यष्टि) एवं
एकतारूप (समष्टि) व्यवहार होता है।
(अज्ञान की) यह व्यष्टि निकृष्ट उपाधि से युक्त होने के कारण मलिन
सत्त्वप्रधान होती है। इस (उपाधि) से युक्त चैतन्य अल्पज्ञता एवं अशक्तता
आदि गुणों वाला होने से, व्यष्टिगत एक ही अज्ञान का प्रकाशक होने के
कारण 'प्राज्ञ' इसप्रकार कहा जाता है। अस्पष्ट उपाधि से युक्त होने के
कारण तथा एक से अधिक का प्रकाशक न होने से इसका प्राज्ञत्व (सिद्ध
है।)
इस (जीव) की भी (व्यष्टिरूप) यह उपाधि, अहंकार आदि का
कारणरूप होने से कारणशरीर तथा आनन्द की प्रचुरता एवं चैतन्य को कोश
के समान ढक लेने के कारण आनन्दमयकोश। सबका उपरम (विलयन)
होने से सुषुप्ति एवं स्थूल तथा सूक्ष्मशरीर आदि प्रपञ्च के विलय का
अधिष्ठान होने के कारण 'लयस्थान' भी कहलाती है।