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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 170 of 314

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Page 170

१५६ वेदान्तसार
अथवा जिसप्रकार जल के कणों के समूह के कथन की इच्छा से
'जलाशय' कहते हैं। ठीक उसीप्रकार अनेक संख्या में प्रतीत होने वाले
जीवों में स्थित अज्ञान के समूह को 'समष्टि' कहते हैं। वस्तुतः यह इन
सभी में ऐक्य का सूचक भी है।
अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार ने 'अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां'
इत्यादि श्रुतिवचन को उद्धृत किया है। इसका अभिप्राय है कि वह अज्ञान
अथवा माया वस्तुतः एक ही है। जो प्रजाओं में अनेकरूपों को धारण करता
है।
विशेष-(1) समष्टि- सम्+√अश् (व्याप्तौ संघाते च)+क्तिन्-सभी को
व्याप्त करने वाला।
(2) व्यष्टि- वि+अश् (व्याप्तौ संघाते च)+क्तिन्-सीमितस्थान में रहने
वाला।
(3) स्वामी रामतीर्थ ने समष्टि एवं व्यष्टि को क्रमशः सामान्य एवं
विशेष अर्थ में प्रयुक्त माना है।
(4) वेदान्तदर्शन में समष्टि अर्थ में 'माया' तथा व्यष्टि के लिए
'अविद्या' शब्द का प्रयोग किया गया है। "सत्त्वशुद्ध्यविशुद्धिभ्यां मायाविद्ये
च ते मते" (पञ्चदशी1/16)।
(5) यहाँ प्रयुक्त 'नानात्वेन' से अभिप्राय यह है कि जीव अनेक हैं
तथा प्रत्येक जीव में अज्ञान की सत्ता पृथक्-पृथक् विद्यमान रहती है। अतः
इस दृष्टि से ही यहाँ अज्ञान के अनेकत्व की परिकल्पना की गयी है।
(6) प्रस्तुत खण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार सरलतापूर्वक समझा जा
सकता है-
चित्र-२९ अज्ञान
समष्टि ➔ समूह व्यष्टि
समूह का सूचक - वन वृक्ष - एकत्व का सूचक
जलाशय जल
जीव समुदाय समूह जीव
अवतरणिका-समष्टि-व्यष्टि एवं इस आधार पर अज्ञान के भेदों का
कथन करने के पश्चात् समष्टिगत अज्ञान द्वारा की गई सृष्टिप्रक्रिया का
उल्लेख करते हैं-