Skip to content
SarvaKosh
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 167 of 314

Read in context
Page 167

अज्ञान निरूपण १५३
अज्ञान वस्तुतः ज्ञानविरोधी है, क्योंकि ज्ञान होने पर वह स्वतः विनष्ट हो
जाता है।
(४) भावरूप-अज्ञान को यहाँ भावरूप भी कहा गया है तथा इसकी
यह विशेषता इसी बात से सिद्ध होती है कि ज्ञान के होने पर वह स्वतः
विलीन हो जाता है। इसके अलावा प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से भी इसकी
भावरूपता का प्रतिपादन किया जा सकता है, क्योंकि व्यक्ति को 'मैं अज्ञ
हूँ' इत्यादि की प्रत्यक्ष अनुभूति अनेकशः होती रहती है। अनुमान एवं
अर्थापत्तिप्रमाण द्वारा भी इसकी भावरूपता को विद्वानों ने सिद्ध करने का
प्रयास किया है।
(५) यत्किञ्चित्-अज्ञान के लिए एक अन्य विशेषण 'यत्किञ्चित्'
भी यहाँ ग्रन्थकार द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इसका अभिप्राय यही है कि
यद्यपि अज्ञान सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों से युक्त एवं भावरूप
है तथापि इसके विषय में कोई भी विद्वान् यह ऐसा ही है-'इदम् इत्थम्'
यह कहने में समर्थ नहीं है। इसीकारण आचार्यों ने इसे 'यत्किञ्चित् (यह
कुछ है), इसप्रकार कहकर इसकी व्याख्या की है। वस्तुतः यही अज्ञान की
विलक्षणता एवं अनिर्वचनीयता को भी सिद्ध करता है।
प्रस्तुत गद्यखण्ड के अन्त में ग्रन्थकार ने 'अहम् अज्ञः' इत्यादि अनुभव-
वाक्य का कथन करके तथा 'देवात्म शक्तिः' इत्यादि श्रुतिवाक्य को प्रस्तुत
करके, अपने कथन की, अज्ञान के लिए दिये गए विभिन्न विशेषणों की
अथवा अज्ञान के अस्तित्व की पुष्टि की है।
विशेष-(1) वस्तुतः वेदान्त के अज्ञान का वर्णन अत्यन्त कठिन है।
पुनरपि ग्रन्थकार ने सूत्रात्मकरूप में उसके स्वरूप का कथन किया है।
(2) यहाँ प्रयुक्त 'अज्ञान' पद वस्तुतः पारिभाषिकशब्द के रूप में
प्रयुक्त हुआ है। अतः इसकी 'न ज्ञानम्, इति अज्ञानम्-नञ् समास' करते
हुए व्युत्पत्ति उचित नहीं है।
(3) वस्तुतः यहाँ अज्ञान 'ज्ञान का अभाव' न होकर ब्रह्म की अन्तरङ्ग
शक्ति 'माया' अथवा अविद्या के रूप में प्रयुक्त हुआ है।
(4) कुछ विद्वानों ने अज्ञान की व्याख्या 'सूर्य के रहते हुए अन्धे
व्यक्ति द्वारा अन्धकार की परिकल्पना' का उदाहरण देकर भी की है।
(5) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा
सकता है-