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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 15 of 314

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Page 15

भूमिका
(क) दर्शन से अभिप्राय-देखना अर्थ में प्रयुक्त √ दृश् धातु से ल्युट्
प्रत्यय करने पर 'दर्शन' शब्द निष्पन्न होता है (अष्टाध्यायी-3/3/114
नपुंसके भावे क्त)। आचार्य पाणिनि के अनुसार 'ल्युट्' प्रत्यय का प्रयोग
भाव, करण एवं अधिकरण- तीन अर्थों में होता है। (ल्युट् च-3/3/115)
(करणाधिकरणयोश्च 3/3/117) यहां भाव से अभिप्राय पूर्णतया शुद्ध धातु
के अर्थ से है। इसप्रकार 'दर्शन' शब्द का अर्थ हुआ-देखना। वह विद्या,
ज्ञान अथवा उपकरण (साधन) जिसके द्वारा किसी विषय या वस्तु को देखा
जाए या जाना जाए अथवा आधारभूत वह वस्तु जिसमें किसी को देखा
जाए।
दर्शन का मानवजीवन के साथ अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है, क्योंकि
मानव के जीवन का कोई भी पक्ष दर्शन की परिधि से बाहर नहीं हो
सकता। सृष्टि के आरम्भ में जब से मानव ने विचार करना प्रारम्भ किया,
उसी समय से उसके कुछ अनुभव स्थायी आकार लेने लगे। स्थायी आकार
से आकारित उसके वे अनुभव ही कालान्तर में दर्शनरूप में परिवर्तित हो
गए।
(ख) दर्शन का विकास-प्रकृति के विभिन्न व्यापारों को देखकर
आदिकाल में मनुष्य अत्यधिक आश्चर्यचकित होता होगा। उसकी सदैव
जिज्ञासा रही होगी कि प्रकृति क्या है? अर्थात् सूरज, चाँद, तारे, पर्वत,
नदियाँ, वृक्ष आदि ये सब क्या हैं? मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? मुझे
कहाँ जाना है? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? यह संसार क्या है? इसे
बनाने वाला कौन है? इस संसार को बनाने वाले और मनुष्य का क्या
सम्बन्ध है? आदि।
ये कुछ प्रश्न ही आदिमानव के मन में, मस्तिष्क में रहे होंगे, जिन्होंने
उसे चिन्तन के लिए बाध्य किया होगा। आगे चलकर इन्हीं प्रश्नों के उत्तर
विद्वान् मनीषियों ने दर्शनरूप में प्रतिष्ठित किए। इन समस्याओं पर
अलग-अलग चिन्तकों ने अलग-अलग शैली द्वारा चिन्तन किया तथा उनके
समाधान का अन्वेषण किया। इसीप्रकार अनेक दर्शनों का भारतवर्ष में
प्रादुर्भाव हुआ। इन्हीं चिन्तन शैलियों को बाद में भारतीयदर्शन के नाम से
प्रसिद्धि प्राप्त हुई।