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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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अनुबन्ध चतुष्टय १३५
आवश्यक है, वहीं उसके लिए परलोक स्वर्गादि में विद्यमान सामग्री के प्रति
भी अनित्यता की भावना धारण करते हुए वैराग्य अनिवार्य है।
इसलोक एवं परलोकविषयक भोगसामग्री के प्रति वैराग्य, साधक को
केवल उसी स्थिति में सम्भव है, जब वह यह विचार करता है कि इस
दृश्यमानजगत् की समस्त भोगविलासविषयक सामग्री, क्योंकि कर्म द्वारा प्राप्त
होती है, अतः अनित्य है, क्योंकि 'यत् यत् कर्मजन्यं तत्तत् अनित्यं' यह
सिद्धान्त सर्वमान्य है। इसी सिद्धान्त के कारण कर्मजन्ययज्ञ आदि से प्राप्त
होने वाले स्वर्ग आदि भी अनित्य हैं। यह निश्चय करके उस समस्त भोग-
सामग्री के प्रति घृणा का भाव रखना, उनमें लेशमात्र भी रुचि न लेना ही
विराग अर्थात् वैराग्य है। यही वेदान्तदर्शन में अधिकारी के लिए द्वितीय
साधन 'इहामुत्रार्थफलभोग विराग' है।
विशेष-(१) साधनानि-यहाँ बताए गए साधनों में पूर्व-पूर्व साधन को
क्रमशः उत्तरोत्तरसाधन की प्राप्ति का हेतु मानना चाहिए, क्योंकि अनित्य
नित्यवस्तु के विवेक के उपरान्त ही उसे इसलोक एवं परलोकविषयक
भोगसामग्री के प्रति वैराग्यभाव उत्पन्न हो सकेगा। इसीप्रकार आगे भी
समझना चाहिए।
(२) 'विराग' से अभिप्राय अरुचि, उदासीनता, घृणा, उपेक्षा आदि
वैराग्यभाव से ग्रहण करना चाहिए।
(३) छान्दोग्योपनिषद् (8.1.6) में कर्मजन्य होने के कारण इसलोक एवं
परलोक की समस्त भोगसामग्री को स्पष्टरूप से अनित्य प्रतिपादित किया
गया है-'तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः
क्षीयत"।
(४) प्रस्तुत गद्यखण्ड में प्रयुक्त 'अमृतादि' से अभिप्राय स्वर्ग में
विद्यमान सुख प्रदान करने वाले अप्सराओं के नृत्य, गीत, संगीत एवं अन्य
भोगपदार्थों से ग्रहण करना चाहिए।
(५) इहलोक एवं परलोकविषयक भोगसामग्री की अनित्यता में उनका
'कर्मजन्य' होना मुख्यहेतु बताया गया है। जिसे इसप्रकार भी समझा जा
सकता है- 'यत्-यत् कर्मजन्यं तत् तत् कार्यम्। यत्यत् कार्यं तत्तत्
अनित्यम्'। अर्थात् जो-जो कर्म से उत्पन्न होता है, वह-वह कार्य है तथा
जो- जो कार्य है वह सब अनित्य है।
(६) प्रस्तुत खण्ड के अभिप्राय को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर
सकते हैं-