वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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तक ही रह सकता है, उनके क्षीण होने पर उसे पुनः पृथ्वी पर ही जन्म
लेना पड़ता है।
(3) उत्तरवेदान्ती नित्यकर्मों द्वारा व्यक्ति के पूर्व पापों का क्षय स्वीकार
करते हैं।
(4) जातेष्टियज्ञ से अभिप्राय पुत्र जन्म के अवसर पर पिता द्वारा किए
गए जातकर्म संस्कार से हैं।
(5) चान्द्रायण-एक उपवास को कहा गया है, जिसमें चन्द्रमा की वृद्धि
एवं क्षय के अनुसार भोजन की मात्रा (ग्रास) को बढ़ाया घटाया जाता है।
(6) परमं प्रयोजनम् में 'परम' विशेषण का प्रयोग अन्य प्रयोजन की
अपेक्षा इसकी महत्ता प्रदर्शित करने के लिए इसकी मुख्यता प्रतिपादित करने
के लिए किया गया है।
(7) विविदिषन्ति-वेत्तुं इच्छन्ति इति। √विद्+सन्+लट्, प्रथम पुरुष,
बहुवचन।
(8) सत्यलोक- भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः एवं सत्यम्। इन
सात उर्ध्वलोकों में सर्वोपरि स्थित लोक, किन्तु इससे मोक्ष अभिप्राय ग्रहण
नहीं करना चाहिए।
(9) साधक नित्य, नैमित्तिक एवं प्रायश्चित्तकर्मों द्वारा पितृलोक तथा
उपासनकर्म द्वारा सत्यलोक को प्राप्त करता है।
(10) उपासनकर्म में साधक सगुणब्रह्म का चिन्तन करते हुए अपने
चित्त को एकाग्र करता है।
(11) शाण्डिल्यविद्या-छान्दोग्योपनिषद् 3.14 में आया हुआ प्रकरण
विशेष, जिसमें सगुणोपासना का विस्तृत वर्णन हुआ है।
(12) अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को दबाकर परमब्रह्म परमात्मा की
आकृति, विशेष की परिकल्पना करते हुए, उसका ध्यान करना ही उपासना
है।
(13) प्रधान और गौणभाव को उदाहरण द्वारा इसप्रकार समझ सकते हैं।
एक वृक्ष को लगाने का प्रधान प्रयोजन फलप्राप्ति, किन्तु गौणप्रयोजन छाया
एवं काष्ठ आदि भी प्राप्त करना होता है।
(14) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा
सकता है-