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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 132 of 314

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Page 132

११८ वेदान्तसार
(१) इन ग्रन्थों के अध्ययन से मोक्ष के इच्छुक साधकों की संसार की
कारणरूप अविद्या नष्ट (विशरण) हो जाती है एवं उनका मोक्षमार्ग प्रशस्त
होता है।
(२) इनके अध्ययनपूर्वक चिन्तन से ब्रह्म की प्राप्ति अथवा ज्ञान होता
है। इसलिए इन्हें उपनिषद् कहते हैं (गति)।
(३) इन ग्रन्थों के अध्ययन द्वारा व्यक्ति के आध्यात्मिक, आधिभौतिक
एवं आधिदैविक तीन प्रकार के दुःख शिथिल होते हैं। (अवसादन) इसलिए
इन्हें उपनिषद् कहा जाता है।
शङ्कराचार्य ने उपनिषद् का मुख्य अर्थ ब्रह्मविद्या तथा अप्रधान अर्थ
'ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन करने वाला विशेषग्रन्थ' किया है-
तस्माद् विद्यायां मुख्यया वृत्त्या उपनिषच्छब्दो वर्तते ग्रन्थे तु भक्त्या...
वस्तुतः नि उपसर्गपूर्वक सद् धातु का एक अर्थ बैठना भी है तथा यहाँ
प्रयुक्त 'उप' उपसर्ग 'समीप' अर्थ का द्योतक है। अतः यज्ञ की दृष्टि से
अग्नि के समीप बैठना, ज्ञान की दृष्टि से गुरु के समीप बैठना, तपस्या
अथवा ध्यान की दृष्टि से निश्चल होकर ब्रह्म के समीप बैठना इत्यादि अर्थ
भी इस शब्द के किए जा सकते हैं। जो उपनिषद्ग्रन्थों के विविध अभिप्रायों
को अभिव्यक्त करते हैं।
इसप्रकार की विशेषताओं से सम्पन्न ज्ञानराशि के अथाह आगार
उपनिषद्ग्रन्थों को प्रमाणरूप में मानकर चलने वाला दर्शन 'वेदान्त' कहा
गया। शारीरकसूत्र आदि ग्रन्थ इन्हीं उपनिषद् एवं वेदान्त की व्याख्या करने
के कारण इनका उपकार करने वाले हैं। शारीरकसूत्र से यहाँ अभिप्राय महर्षि
व्यास विरचित ब्रह्मसूत्र से है तथा 'आदि' शब्द श्रीमद्भगवद्गीता के लिए
प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता एवं ब्रह्मसूत्र आदि ग्रन्थ इसी
वेदान्त की सरलतम व्याख्या के लिए लिखे गए हैं। यहाँ प्रयुक्त 'शारीरक
सूत्र' शब्द भी व्याख्या की अपेक्षा रखता है-
(ग) शारीरकसूत्रादीनि-"शरीरमेव शरीरकं तत्र भवो जीवः शारीरकः
स सूत्र्यते यथातथ्येन निरुप्यते यैस्तानि शारीरकसूत्राणि अथातो
ब्रह्मजिज्ञासेत्यादीनि" अर्थात् शरीर शब्द से 'कुत्सा' अर्थ में 'क' प्रत्यय
करने पर शरीरक शब्द निष्पन्न होता है। तत्पश्चात् 'तत्र भवः' इस अभिप्राय
की अभिव्यक्ति के लिए 'अण्' प्रत्यय करने पर आदिवृद्धि होकर शारीरक