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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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Page 118

१०४ वेदान्तसार
समय पूर्व देवदत्त को अन्यत्र किसी स्थान पर देखा था। उसी देवदत्त को
अपने सामने पाकर वह व्यक्ति पहले देखे गए देवदत्त को याद करके
अनायास ही कह उठता है—‘अरे! यह तो वही देवदत्त है’ (सोऽयं देवदत्तः)
इस वाक्य में प्रयुक्त ‘सः’ शब्द तत्काल एवं तद्देशविशिष्ट देवदत्त का
बोध कराने वाला है, जबकि ‘अयम्’ शब्द से एतत्काल, एतद्देशविशिष्ट
देवदत्त का बोध होता है। यद्यपि सामान्यदृष्टि से हमें इस वाक्य में उस
समय एवं उस स्थान तथा इस समय और इस स्थान के कारण काल तथा
देशगत विरोध की प्रतीति होती है, तथापि सामानाधिकरण्यसम्बन्ध से इन
दोनों शब्दों का अर्थ एक ही देवदत्तरूप पिण्डविशेष में पर्यवसित हो जाता
है। कहने का अभिप्राय यह है कि इस सम्बन्ध द्वारा ये दोनों पद (सः और
अयम्) एक ही देवदत्त का बोध कराते हैं।
ठीक इसीप्रकार ‘तत्त्वमसि’ इस महावाक्य में प्रयुक्त ‘तत्’ शब्द परोक्षत्व
एवं सर्वज्ञत्व आदि गुणों से विशिष्टचैतन्य का कथन करता है तथा ‘त्वम्’
पद प्रत्यक्षत्व एवं अल्पज्ञत्व आदि गुणों से विशिष्ट चैतन्य अर्थात् जीव का
वाचक है। पूर्ववाक्य ‘सोऽयं देवदत्तः’ के अनुसार ही यद्यपि यहाँ भी तत्
एवं त्वम् पदों के अर्थों में परोक्षत्व एवं प्रत्यक्षत्व तथा सर्वज्ञत्व और
अल्पज्ञत्व के कारण प्रथमदृष्टि में विरोध की प्रतीति होती है, किन्तु यहाँ
प्रतीत होने वाला विरोध वास्तविक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ‘तत्’ पद
द्वारा जिस चैतन्य की तथा ‘त्वम्’ पद द्वारा जिस चैतन्य की यहाँ प्रतीति हो
रही है, उन दोनों में कोई भेद नहीं है। वस्तुतः इन दोनों में भी पूर्ववत्
सामानाधिकरण्य सम्बन्ध द्वारा एक चैतन्य में समानरूप से तात्पर्य परिलक्षित
होने से इन दोनों में अभेद का बोध कराया जा रहा है।
(२) विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध—जो शब्द अपने विशेष्य को अन्य
शब्दों द्वारा विशेषरूप से अलग कर देता है, विशेषण तथा जो विशेषरूप से
अलग होता है, वह विशेष्य कहलाता है। जैसे—‘नीलोत्पलम्’ इत्यादि वाक्य
में ‘नील’ पद विशेषण तथा ‘उत्पल’ विशेष्य है। यहाँ विशेषण ‘नील’ पद
विशेष्य उत्पल अर्थात् कमल को नीले रंग से भिन्न सभी लाल, पीले, श्वेत
आदि रंगों से अलग कर देता है। इसप्रकार यहाँ प्रयुक्त विशेषण न केवल
विशेष्य की विशेषता प्रदर्शित करता है, अपितु उसके विरोधीधर्मों से भी
उसकी भिन्नता बताकर विरोधी धर्मों का व्यावर्तन कर देता है। ठीक
इसीप्रकार ‘सोऽयं देवदत्तः’ इस वाक्य में ‘सः’ और ‘अयम्’ ये दोनों पद