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वासिष्ठ धर्मशास्त्र (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन वैदिक स्मृति सटीक)

Vasishtha Dharmashastra with Commentary

by महर्षि वसिष्ठ / डॉ. अलोइस फुहरर

DevanagariSanskritpublished106 pages
Page 101Permalink

INDEX TO THE VEDIC MANTRAS
Quoted in Vasiṣhṭha's Dharmaśāstra.
[ This Index does not include short sacrificial formulas
and invocations, and those mantras which are quoted by
their names only, such as e. g. Aghamarshaṇa, Devakṛta,
&c. See the references in Prof. Bühler's translation. ]

अकामतोपनतं मधु २३, १३. | निरुक्तं होतः कनीयो भवति २०, २१.
अग्निगचार्यस्तव ७, ६. | पश्चात्सिन्धुर्विधारणी १, १५.
अग्निर्वै ब्राह्मणः ३०, ३. | प्रजाभिरग्ने अमृतत्वमश्याम १७, ४.
अञ्जनाभ्यञ्जनमेवास्या न ५, ९. | प्रत्तानां च स्त्रीणां ४, १८.
अत्र ह्येष्यद्दम्पत्यं भवति २०, ३६. | प्रेत्य चाभ्युदयिकं १, ४६.
अनग्निकानुदक्या वामृतं ५, २. | ब्रह्मपुरोहितं राष्ट्रमृध्नोति १९, ४.
अनिर्दशाहे परशवे ४, ३२. | ब्राह्मणो आपद उद्धरति १, ४७.
अनन्ताः पुत्रिणां लोकाः १७, २. | ब्राह्मणो वेदमाढ्यं करोति १, ४५.
अप नः शोशुचदघं २६, ५. | ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ४, २.
आपि नः श्वो विजनिष्यमाणाः १२, २४. | भक्ष्यो धेन्वनडुहो मेध्यो १४, ४६.
अप्रजाः सन्त्वत्रिणः १७, ३. | मनसा भर्तुरावचारे २१, ६.
अभिशस्तो गोसवेनाग्निष्टु तां २२, ७. | महाजं वा पचेद्देवमस्मा ४, ८.
अविज्ञाता हि गर्भाः पुंमासो भवन्ति | या पत्युः क्रीता १, ३७.
२०, २४. | यमेव विद्याः शुचिमप्रमत्तं २, ९.
अवार्यवदपत्यं भवति १२, ३१. | राजन्यश्चेदब्राह्मणीमभिगच्छेच्छरपत्रैः
अस्य वामस्य २६, ६. | २१, ३.
आचमेदाग्निश्च मामन्युश्च २३, २३. | लाङ्गलं पवीरवत्सुशेवं २, ३४.
इन्द्रस्त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रं हत्वा ५, ८. | लोमानि मृत्योर्जुहोमि २०, २६.
इष्टापूर्तस्य त षष्ठमंशं १, ४४. | वाक्संबन्ध एतदेव मांसं २१, ७.
एकेन वह्नंश्चाग्ने १५, ८. | विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम २, ८.
गायत्र्या ब्राह्मणमसृजत ४, ३. | वैश्यश्चेदब्राह्मणीमभिगच्छेल्लोहितदर्भैः
गुरुवद्गुरुपुत्रस्य वर्तितव्य १३, ५४. | २१, २.
तन्न सद्यो ब्राह्मणस्य शरीरं ३०, ५. | वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो ११, १३
तराति सर्वं पाप्मानं २२, ६. | व्याव्ये तु संवत्सर २१, ८.
तस्माद्दुहितृमतेधिरथं शतं १, ३६. | शुनःशेपो वै यूपे नियुक्तो १७, ३५.
तस्माद्ब्राह्मणोनाद्यः १, ४५. | शूद्रश्चेदब्राह्मणीमभिगच्छेद्धीरणैः २१,१
त्रिभिर्ऋणैऋणवान्ब्राह्मणो ११, ४८. | सा नाञ्ज्यान्नाभ्यञ्ज्यान्नाप्सु ५, ७,
त्रिराजितो वापराद्धः पूतो भवति २०,२८ | सोमोस्य राजा भवति १, ४५.
त्रैविद्यवृद्धा यं १, १६. | सपिण्डत्वं साप्तपुरुषं ४, १७.
द्वयम्र ह वै पुरुषस्य रेतो २, ५. | हरिश्चन्द्रो वै राजा १७, ३२.
न तमंहः २६, ७. | हविष्यन्तमजरं २६, ७.

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